या देवी सर्वभूतेषु… दुर्गा पूजा विशेष…

मृदुला सिन्हा

बचपन में दादी के साथ देवी मंदिर जाने का बड़ा आनंद होता था. दादी एक रंग-बिरंगी डलिया को धो-पोंछ कर चूड़ी, बिंदी, सिंदूर रखकर कपड़े से ढंक लेतीं. भगवती स्थान पर आश्विन माह के नौ दिनों तक भीड़ लगी रहती.

पूजा-अर्चना होती. भगवती स्थान पहुंच कर महिलाएं गाती रहतीं-“अइली शरणिया तोहार हे जगतारण मैया लाले मंदिर के लाले दरवजवा लाले कोठरिया तोहार हे जगतारण मैया मांगिले अंचरा पसरा हे जगतारण मैया”

और भी बहुत से गीत जो मां की शक्ति का गुणगान करते थे. उन्हें सिंदूर, बिंदी और चूड़ियां चढ़ा कर प्रसाद के रूप में वापस ले लिया जाता था. दादी घर लौट कर उस दिन घर आने वाली सभी औरतों को सिंदूर लगातीं.

प्रसाद होता था वह सिंदूर. हम दादी के द्वारा किए उपक्रमों को ध्यान से देखते थे. उसका अर्थ नहीं समझते थे. दादी नौ दिनों तक घर में भी देवी की पूजा-अर्चना करतीं. उम्र बढ़ने के साथ माह की भी पहचान हो गई.

यूं तो पूजा-अर्चना हमेशा ही होती रहती थी. कुल देवता, गृह देवता, शिव, राम, कृष्ण सबकी पूजा होती थी. परंतु बरसात के उपरांत नवरात्र की पूजा-अर्चना की विशेष पहचान बनती है. नौ दिनों तक चली पूजा. यह पूजा व्यक्तिगत भी होती थी.

लगभग हर गांव में देवी स्थान होता ही है. वहां भी होती थी नवरात्र की पूजा. बाद में चलकर गांवों में भी दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना होने लगी. गांव वाले अपनी जरूरतों की चीजें उस मेले में खरीदते. चार-पांच ही दुकानें होती थीं.

वहां बिक रही जलेबियों का स्वाद आज भी हमारी जिह्वा पर तैरता है. उम्र बढ़ने के साथ देश में प्रवास करते और पढ़ते-सुनते यह अनुभूति हुई कि देश के कोने-कोने में देवी की पूजा होती है. अलग-अलग क्षेत्र में भिन्न-भिन्न तरीके से मनाया जाता है नवरात्र.

नवरात्र व्यक्तिगत आराधना है. नौ दिनों तक दुर्गासप्तशती के पाठ होते हैं. परंतु मंदिरों और दुर्गा स्थापना के बाद दुर्गा पूजा स्थलों पर भी दुर्गासप्तशती का पाठ सामूहिक रूप से किया जाता है. भारत के कोने-कोने में नवरात्र मनाया जाता है, परंतु इनका रूप-रंग भिन्न-भिन्न होता है.

सादा भोजन, फलाहार व्रत की भोजन सामग्रियां घर में ही नियम-निष्ठा के साथ तैयार होती थीं. पूजा-अर्चना में भी सादगी थी. परंतु आज शहरों और शहरों से चलकर गांवों में भी भव्य और कीमती मूर्तियों की स्थापना की प्रतिस्पर्धा हो रही है. मूर्ति की सजावट पर भी अधिक से अधिक खर्च. चारों ओर जो बाजार लगते हैं, उनकी भव्यता के कहने ही क्या .

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के अक्टूबर अंक में…

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