नेहरू ने जांच क्यों नहीं कराई

गुंजन कुमार

मैं आपसे किसी तरह की सांत्वना पाने के लिए यह पत्र नहीं लिख रही हूं लेकिन मैं आपसे यह जरूर मांग करती हूं कि न्याय हो. मेरे बेटे की मौत कैद में हुई है.

कैद भी बिना सुनवाई के. आपने यह बताने की कोशिश की है कि कश्मीर की सरकार ने सब कुछ किया, जो किया जाना चाहिए था. आपने जो कुछ कहा उसका आधार आप को दी गई जानकारी और भरोसा होगा.

उनकी क्या कीमत है, मैं पूछती हूं, उस जानकारी की, जो उन लोगों की ओर से दी जा रही है, जिन्हें कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था. आप कहते हैं, आप मेरे बेटे की कैद के दौरान कश्मीर गए थे.

आप उस स्नेह की बात करते हैं जो उनके लिए आपके दिल में था. लेकिन आश्चर्य है कि आपको व्यक्तिगत तौर पर जाकर उनसे मिलने से किसने रोका था और आपने खुद जाकर क्यों नहीं देखा कि उनकी सेहत की देखभाल के लिए क्या इंतजाम है?

यह उस पत्र का हिस्सा जो डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू क लिखा था. वे पत्र में आगे लिखती हैं कि इस बात की पक्की जानकारी है कि मेरे बेटे की तबीयत कैद में डाले जाने के बाद से ही अच्छी नहीं थी.

वह कई बार बुरी तरह बीमार पड़ा और वह भी एक के बाद एक कई दिनों के लिए. मैं पूछती हूं क्यों नहीं कश्मीर की सरकार या आपकी सरकार ने मुझे या मेरे परिवार को इस बात की जानकारी दी?

जो सीधे तौर पर सरकार की लापरवाही का प्रमाण है.आपने डॉक्टर मुखर्जी को कैद के दौरान दी गई सुविधाओं और सुख-साधनों का जिक्र किया है. यह विषय हैं, जिन पर चर्चा होनी चाहिए.

कश्मीर की सरकार में इतना भी शिष्टाचार नहीं था कि वे घर से आने वाली चिट्ठियों को बिना रोक-टोक उन तक पहुंचने देती. चिट्ठियों को कई दिनों तक रोक कर रखा जाता था.

उनमें से कुछ तो रहस्यमयी ढंग से गायब ही हो गई. घर का समाचार पाने की उनकी चिंता, खास तौर पर अपनी बीमार बेटी और मेरे लिए चिंता ने उन्हें बेहाल कर दिया.

क्या आप यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि पिछले 27 जून को हमें उनकी वे चिट्ठियां मिलीं, जो 15 जून की थी, इसे कश्मीर की सरकार ने एक पैकेट में 24 जून को भेजा, यानी उनका शव भेजने के अगले दिन.

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 1-15 जुलाई के अंक में….

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