मुसलमान वोट बैंक क्यों बने?

बनवारी

इस बार के चुनाव परिणामों ने सबसे बड़ी चुनौती देश के मुसलमानों के सामने खड़ी की है. अब तक उन्हें वोट बैंक की तरह उपयोग किया जाता रहा है. 

अपने आपको सेक्युलर दिखाने वाले सभी दल उनमें असुरक्षा पैदा करते हुए अपने आपको उनका सबसे बड़ा हितैषी दिखाते रहे. अपने आपको सेक्युलर कहने वाले दल और नेता मुख्यतः हिन्दू समुदाय के हैं और उसी से बल प्राप्त करते हैं. 

पर वे मुसलमानों को यह भय दिखाते रहते हैं कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं. उनमें कुछ मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक शक्तियां सक्रिय हैं. उनकी शक्ति बढ़ी तो मुसलमानों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. 

इसलिए लोकतंत्र में उन्हें वोट देने की जो शक्ति मिली हुई है, उसका इस्तेमाल करके वह उसी पार्टी को जिताएं, जो उन्हें सुरक्षा देने का आश्वासन देती हो. यह काम लंबे समय तक कांग्रेस ने किया. 

लेकिन आपात स्थिति के दौरान संजय गांधी के नसबंदी अभियान के दौरान मुसलमानों को अनुभव हुआ कि उन्हें सबसे बड़ा खतरा तो अपने आपको सेक्युलर बताने वाली कांग्रेस पार्टी से है. 

इसलिए उत्तर भारत में उन्होंने 1977 के चुनाव से कांग्रेस से किनारा कर लिया. उनके वोट पर अपना अधिकार जताने वाली नई पार्टियां उभर आईं. 

देश भर में कांग्रेस, समाजवादी या मार्क्सवादी आंदोलन से निकले अनेक नेताओं ने नई क्षेत्रीय पार्टियां खड़ी कर दीं. सबकी राजनीति का प्रधान स्वर यही रहा है कि वे देश की सांप्रदायिक ताकतों से लड़ रही हैं. 

इसलिए अकेली वे मुस्लिम वोटों की सबसे बड़ी हकदार है. अपने लगभग संगठित वोट के बल पर मुसलमानों में यह भ्रम फैला रहा है कि एक वोट बैंक के रूप में वे देश की राजनीति को नियंत्रित कर सकते हैं. 

यही उनकी सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है. वे अपने वोटों की संख्या के बल पर अपने आपको सेक्युलर मानने वाली सभी पार्टियों को अपने सांप्रदायिक हितों की आसानी से रक्षा करवा सकते हैं.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 09 जून के अंक में…

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