भगवान जगन्नाथ क्यों पड़ते हैं बीमार ,जानें मंदिर से जुड़ी अद्भुत बातें

Lord Jagannath
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on whatsapp
WhatsApp

नई दिल्ली. ओडिशा के पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा  देश के धार्मिक उत्सवों में से एक है, जिसमें भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु  आते हैं….इस धार्मिक यात्रा को लेकर जगन्नाथ मंदिर में तैयारियां कुछ दिन पहले ही पूरी कर ली जाती है….

चार पवित्र धामों में से एक श्री जगन्नाथ धाम –इस पर्व को अटूट, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है…. पुरी के अलावा भी देश के अलग-अलग शहरों में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है…चार पवित्र धामों में से एक श्री जगन्नाथ धाम में भगवान विष्णु जगन्नाथ रूप में विराजते हैं…. आइए विस्तार से जानते हैं भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और इसके इतिहास के बारे में….

108 पवित्र कलशों से कराया जाता है स्नान- रथयात्रा निकालने की परंपरा की बात करें तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्नान पूर्णमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन होता है…. इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम औप बहन सुभद्रा को रत्म सिंहासन से उतारकर मंदिर के पास समीप बने एक मंडप में ले जाया जाता है…यहां इन्हें स्नान कराया जाता है. ..ये स्नान 108 कलशों के माध्यम से कराया जाता है.

15 दिन तक कमरे में रहते हैं भगवान- कहा जाता है स्नान करने के बाद भगवान बीमार हो जाते हैं….इनका शरीर तपने लगता है. ..इसके बाद इन्हें एक खास कमरे में रखा जाता है. ..यहां भगवान 15 दिनों तक रहते हैं.. इस दौरान भगवान के कक्ष में सिर्फ मंदिर के प्रमुख सेवकों और वैद्यों को ही होती है.

स्वस्थ होकर भाई और बहन के साथ भ्रमण पर निकलते हैं- 15 दिन समय बिताकर जब भगवान कक्ष से बाहर निकलते हैं तो वे लोगों को दर्शन देते हैं… इसे नव यौवन नैत्र उत्सव कहा जाता है…. इसके बाद भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम के साथ बाहर आते हैं और अपने रथ पर विराजमान होकर भ्रमण करने निकलते हैं….यही जगन्नाथ की रथ यात्रा कहलाती है….

सोने की झाडू लगाकर रथ यात्रा का शुभारंभ –परंपरा के मुताबिक भगवान जगन्नाथ के रथ के सामने राज परिवार के लोग सोने की झाडू लगाकर रथ यात्रा का शुभारंभ करते हैं…इसे ‘छेरा-पहंरा’ की रस्म अदा कहते हैं….उसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच तीन विशाल रथों को सैंकड़ों लोग खींचते हैं.

सबसे पहले बालभद्र का रथ आगे चलता है उसके बाद बहन सुभद्रा, और फिर आखिर में भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा जाता है…..ऐसी मान्‍यता है कि रथ खींचने वाले लोगों के सभी दुख दूर हो जाते हैं और उन्‍हें मोक्ष प्राप्‍त होता है….नगर भ्रमण करते हुए शाम को ये तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं.

गुंडिचा मंदिर भगवान की मौसी का घर- अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में प्रवेश करते हैं और सात दिन वहीं रहते हैं…..गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है. ..रथ यात्रा के दौरान साल में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहनों के साथ जगन्नाथ मंदिर से इसी गुंडिचा मंदिर में रहने के लिए आते हैं….अपनी मौसी के घर में का खूब आदर-सत्‍कार होता है…

खास लकड़ी से बना होता है जगन्नाथजी का रथ- जगन्नाथजी का रथ सोलह पहियों का होता है, जिसमें 832 लकड़ी के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है.. खास बात है कि इन रथों को बनाने के लिए किसी धातु का इस्तेमाल नहीं किया जाता है…ये खास लकड़ी के बनाए जाते हैं….बात करें इस मंदिर की शैली की तो ये कमाल की है…

कलिंग शैली में हुआ मंदिर का निर्माण, भक्तों की अपार श्रृद्धा- इसका मंदिर का निर्माण कलिंग शैली में हुआ है…हिंदु धर्म की मान्यताओं की मानें तो ,जो भी व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल हो कर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्य मिलता है…. धरती का बैकुंठ धाम कहे जाने वाले जगन्नाथ धाम में भक्तों की इसमें अपार श्रृद्धा हैं.