हिन्दी फिल्में देखने वाले तमिलनाडु में हिन्दी विरोध क्यों

तमिलनाडु में फिर से एक बार हिन्दी का राजनीतिक विरोध शुरू हो गया है. दरअसल विरोध नई शिक्षा नीति (2019) के मसौदा में त्रिभाषा फार्मूले पर था. यह विरोध जमीन पर कितना था, यह जानने के लिए कभी तमिलनाडु भी चले जाना चाहिए. सच तो यह है कि 60 के दशक की तुलना में दक्षिण राज्यों में अब तो हिन्दी का विरोध रत्तीभर भी नहीं रहा. अब वहां पर हिन्दी का विरोध करना सिर्फ सियासी मामला है.

जिस राज्य में हिन्दी फिल्मों को देखने के लिए जनता सिनेमा घरों में उमड़ती हो वहां पर हिन्दी विरोध की बातें करना नासमझी ही माना जाएगा. हिन्दी सिनेमा को जानने –समझने वाले तमिल मूल के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मणिरत्नम से खूब बेहतर तरीके से परिचित हैं. वे तमिल तथा हिन्दी दोनों भाषाओं के ख्यातिप्राप्त फ़िल्म निर्माता हैं. मणिरत्नम एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फिल्मों में काम करके फिल्म कलाकार अपने आप को भाग्यशाली समझता है.

उन्होंने ‘रोजा’ (1992), ‘बॉम्बे’ (1995), ‘दिल से’ (1998) जैसी फिल्में दीं, जो पूरी तरह से आतंकवाद के ऊपर आधारित थीं. तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता तक ने भी एक हिन्दी पिक्चर में काम किया था. उस फिल्म का नाम ‘इज्जत’ था. उस फिल्म में वो धर्मेन्द्र की हिरोइन बनी थीं.

जिस तमिलनाडू में कथित तौर पर हिन्दी को विरोध हो रहा है, वहां पर आयुष्मान खुराना, ऱणवीर सिंह, आमिर खान और सलमान खान की फिल्में खूब देखी जा रही हैं. हाल के दौर में वहां पर ‘दंगल’ तथा ‘बधाई हो’ फिल्में खूब पसंद की गईं. तमिल सिनेमा के पुराण पुरुषों जैसे कमला हासन और रजनीकांत ने बहुत सी हिन्दी फिल्मों में काम किया है.

वैजयंती माला, हेमा मालिनी और रेखा भी तो मूल रूप से तमिल ही हैं. अब आप समझ सकते हैं कि वहां पर हिन्दी के विरोध का सच. भारत के सभी हिस्सों में हिंदी सिनेमा को पसंद करने वाले ही लोग हैं. दक्षिण भारत के सभी राज्यों में भी हिंदी सिनेमा के दर्शकों की बड़ी भारी संख्या है. यह कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्में पूरे भारत की साझी विरासत हैं.

महात्मा गांधी कहते थे कि “हिन्दी भारत की भाषा है. भारत के लिए देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता. अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है. और हिन्दी ही इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है.”

गांधी जी से ज्यादा इस देश को कोई नहीं जान-समझ सकता. उनकी हिन्दी को लेकर इस तरह की राय थी. तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध करने वाले याद रखें कि देश अपनी सभी भाषाओं का आदर सम्मान कर रहा है. कहीं कोई किसी पर भाषा नहीं थोपी जा रही. सभी भारतीय एक-दूसरे की मातृभाषाओं का सम्मान कर रहे हैं. तो फिर हिन्दी का अचानक विरोध क्यों हो रहा है?

हिन्दी का विरोध करने वालों को समझना होगा कि हिन्दी भी इस धरती की भाषा है. इसे भारत के करोड़ों लोग अपनी मातृभाषा मानते हैं. इसलिए अकारण हिन्दी का अनादर करना सही नहीं माना जा सकता.

तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध करने वाले यह कदापि न भूलें कि इसकी उनके राज्य में बहुत गहरी जड़े हैं. 1918 में मद्रास में ‘हिन्दी प्रचार आंदोलन’ की नींव रखी गई थी और उसी वर्ष स्थापित हिन्दी साहित्य सम्मेलन आगे चलकर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के रूप में स्थापित हुआ. बाद में तमिल और अन्य दक्षिणी राज्यों की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए ही इस संस्था को ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ घोषित किया गया.

वर्तमान में इस संस्थान के चारों दक्षिणी राज्यों में प्रतिष्ठित शोध संस्थान है और बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय मूल के साहित्यप्रेमी इस संस्थान से हिन्दी सीख रहे हैं. हिन्दी के प्रसार और प्रतिष्ठा में संलिप्त हजारों दक्षिण भारतीय बंधु न मात्र हिन्दी से अपनें रोजगार के अवसरों को स्वर्णिम बना रहें हैं, अपितु दक्षिण में हिन्दी प्रचार के क्रम में ऐसी कई प्रतिष्ठित हिन्दी संस्थाओं को भी स्थापित करते रहे हैं.

महात्मा गांधी के हिन्दी प्रचार आंदोलन के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना मद्रास नगर के गोखले हॉल में डॉ सी.पी. रामास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेन्ट ने की थी. गांधीजी जी इसके आजीवन सभापति रहे. महात्मा गांधी और उनके बाद के बाद हिन्दी के महान उपासक डॉ राजेन्द्र प्रसाद इस संस्था के अध्यक्ष बने. यह संस्था “हिन्दी समाचार” नाम की एक मासिक पत्रिका भी निकालती है.

‘दक्षिण भारत’ नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका में दक्षिण भारतीय भाषाओं की रचनाओं के हिन्दी-अनुवाद और उच्चस्तर के मौलिक साहित्यिक लेख छपते हैं. हिन्दी अध्यापकों और प्रचारकों को तैयार करने के लिए सभा के शिक्षा विभाग के मार्गदर्शन में ‘हिन्दी प्रचार विद्यालय’ नामक प्रशिक्षण विद्यालय तथा प्रवीण विद्यालय संचालित होते हैं.

इस बीच, हिन्दी के महत्व पर सबसे सटीक टिप्पणी की मूल रूप से तमिलभाषी एचसीएल टेक्नोलोजीस के खरबपति चेयरमेन शिव नाडार ने. वे कहते हैं हिन्दी पढ़ने वाले छात्रों को अपने करियर को चमकाने में लाभ ही मिलेगा. वे कुछ समय पहले अपने सेंट जोसेफ स्कूल के एक समारोह में बोल रहे थे. वे भारत के सबसे सफल कारोबारी माने जाते हैं और लाखों पेशेवर उनकी कंपनी में काम करते हैं.

हिन्दी का विरोध करने वालों को शिव नाडार जैसे सफल उद्यमी से सीख लेनी चाहिए. अंत में एक बार और कि अगर हिन्दी भाषी राज्य अपने यहां दक्षिण भारतीय भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था करें तो इसमें बुराई ही क्या है. अभी तक इन राज्यों में बच्चों को त्रि भाषा फार्मूले के तहत हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा उर्दू और संस्कृत विषय पढ़ने का विकल्प मिलता है. इस विकल्प का विस्तार होना चाहिए. इस लिहाज से हरियाणा में पहल हुई है.

ये तो स्वीकार करन होगा कि गैर-हिन्दी भाषी राज्यों के लोग हिन्दी भाषी सूबों की जनता की तुलना में अधिक भाषाओं को लिख-पढ़-बोल लेते हैं. एक कन्नड़ व्यक्ति अपनी मातृभाषा के अलावा हिन्दी, अंग्रेजी और दक्षिण भारत की कम से कम एक भाषा को जानता है. यदि हिन्दी भाषी भी कोई दक्षिण भारत की भाषा जान लें तो इससे देश को लाभ होगा.

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