मोदी को मारने की धमकी देने वाले को कांग्रेस का टिकट क्यों?

आर.के. सिन्हा

कांग्रेस ने अपने आगामी लोकसभा चुनावों के लड़ने वाले उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करके एक संदेश साफ दे दिया है कि वो उस इंसान को अपना उम्मीदवार बनाने से कभी पीछे नहीं हटेगी जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मारने की धमकी दे चुका होगा.

इसके साथ ही अब कांग्रेस ने सरकार का विरोध करने की सारी सीमाओं को लांघते हुए खुले आम वायुसेना की पाकिस्तान के बालाकोट में कार्रवाई पर सवाल भी खड़े करने चालू कर दिए हैं.

सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस ने इमरान मसूद को दुबारा अपना उम्मीदवार बनाया है. याद कीजिए कि ये वही शख्स हैं जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भरी सभा में नरेन्द्र मोदी को मारने की धमकी दी थी.

आपको यू ट्यूब पर इमरान मसूद के तमाम वीडियो देखने को मिल जाएंगे जिसमें वो मोदी के खिलाफ बदबूदार भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

वो पिछले लोक सभा चुनाव में भी कांग्रेस के सहारनपुर से प्रत्याक्षी थे. इमरान मसूद के मोदी जी के खिलाफ दिए बयान के बाद देश भर में तगड़ा हंगामा हुआ था. कांग्रेस की कसकर आलोचना भी हुई थी.

नरेंद्र मोदी के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने वाले इमरान मसूद को गिरफ्तार भी कर लिया गया था. उम्मीद के मुताबिक, इमरान मसूद चुनाव लोकसभा हार गए थे. वहां पर बीजेपी के उम्मीदवार को शानदार सफलता मिली थी.

चुनाव का कोलाहल खत्म होने के बाद इमरान मसूद को भी देश भूल गया था. इस तरह के इंसान को याद करने का किसी के पास न तो वक्त था, न ही इसकी कोई जरूरत ही थी. पर इमरान मसूद कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के खासमखास बने रहे.

इसलिए तो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने इमरान मसूद को इतनी इज्जत दी कि उन्हें उम्मीदवारों की उस पहली सूची में जगह मिली जिसमें राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी थे. यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपशब्द कहने वाले शख्स को कांग्रेस लोकसभा चुनावों में अपना उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं किया. यह कांग्रेस ने बिल्कुल साफ कर दिया है.

लोकतंत्र का मोटा-मोटी मतलब होता है वाद, विवाद, संवाद. लोकतंत्र की प्राण और आत्मा है. वैचारिक मतभेद होने पर भी अपने विरोधी के प्रति आदर का भाव रखना. अगर इस न्यूनतम शर्त को भी कोई राजनीतिक दल या उसका नेता मानने से इंकार करता है, तब तो फिर लोकतंत्र का कोई मतलब ही नहीं रह जाता. पर इमरान मसूद को बेशर्मी से अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने अपना असली चेहरा फिर से देश के सामने रख दिया है.

कांग्रेस का राष्ट्र विरोधी चेहरा देश ने पुलवामा में हुए आतंकी हमले के जवाब में बालाकोट में भारतीय वायुसेना की एयरस्ट्राइक के बाद आई अप्रत्याशित प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा. कांग्रेस सांसद कपिल सिब्बल ने ट्वीट करके सरकार से वायुसेना की कार्रवाई के पुख्ता प्रमाण मांगे.

अगर सिब्बल को देश की सेनाओं की क्षमताओं पर यकीन ही नहीं हो रहा है, तब तो उन्हें प्रमाण इकट्ठा करने पाकिस्तान के बालाकोट ही चले जाना चाहिए. वहां पर जाकर बर्बादी के निशान जरूर मिल जाएँगे. ताजे कब्रों के दर्शन भी हो जायेंगे.

जाहिर है, कपिल सिब्ब्ल ने भारतीय वायु सेना पर जो सवाल उठाए हैं, वो अवश्य ही राहुल गांधी की सहमति के बाद ही उठाए होंगे. कांग्रेसी नेताओं को भारत की नहीं बल्कि अन्य देशों के मीडिया पर भरोसा है.

कपिल सिब्बल को अच्छा लगता है जब पाकिस्तानी मीडिया कहता है कि भारतीय हमले में पाकिस्तान के किसी भी आतंकी को कोई नुकसान नहीं हुआ. 1971 की जंग के वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ सारा देश खड़ा था.

तब जनसंघ के शिखर नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी से मिल कर उन्हें हर तरह के समर्थन का वादा किया था. पर जब एक गैर-कांग्रेसी सरकार के दौरान देश को युद्ध जैसी स्थिति से गुजरना हुआ तो कांग्रेस ने तुरंत पीठ दिखा दी.

गुस्ताफी माफ हो, कांग्रेस को भारतीय वायुसेना के जाबांजों की बहादुरी पर भरोसा नहीं है. याद रखे कि इसी कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने लादेन को एक बार “ओसामा जी” तक कहा था. दिग्विजय सिंह भी जवानों की शहादत का मजाक उड़ा रहे हैं.

पी.चिदम्बरम और मनीष तिवारी भी इन दिनों सरकार से वायुसेना के एक्शन पर विवादित बयानबाजी करने से बाज नहीं आ रहे हैं. ये सवाल पूछने वाले यह भी बता दें कि क्या इनके कुनबे में से कभी कोई सेना में गया भी है? एक बार ये रणभूमि को देख तो लें, तब इन्हें पता चलेगी जन्नत की हकीकत.

आप भी एक बात पर गौर करें कि कांग्रेस के नेताओं से लेकर मायावती, अरविंद केजरीवाल वगैरह को सैन्य कार्रवाई की सफलता पर तो भरोसा नहीं हो रहा है, पर इन्हें किसी शहीद शूरवीर के अंतिम संस्कार में शामिल होने से कौन रोक रहा है?

पुलवामा के शहीदों का संबंध सारे देश से था. इनके अंतिम संस्कार में देश की जनता की जबरदस्त भागेदारी रही. इन शहीदों को देश ने नम आंखों से विदा किया. इन शहीदों के अंतिम संस्कारों से सारे विपक्षी नेता लगभग नदारद रहे.

क्या शहीद भी मोदी सरकार के या बीजेपी के थे? क्या इन्हें शहीदों के परिजनों के साथ इन कठोर पलों में खड़े नहीं होना चाहिए था? पर इन्हें शर्म कहां आती है. ये तो सत्ता को येन केन प्रकारेण कब्जाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं.

इन्हें तो सरकार का मात्र विरोध के लिए ही विरोध करना है. ये सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की दुहाई देने वाले उस इंसान को अपना उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं करते जो संसद में सवाल पूछने के बदले में पैसा लेने पर लोकसभा से निष्कासित हो चुका है.

राजाराम पाल को राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की अकबरपुर सीट से दिया टिकट है. बेशक, कानपुर देहात की अकबरपुर सीट पर कांग्रेस ने अपने पूर्व सांसद राजाराम पाल को अधिकृत रूप से प्रत्याशी घोषित करके सबको चौंकाया है. 2009 में यहां से पार्टी के सांसद रहे पाल वर्ष 2014 के चुनाव में मोदी लहर के चलते तीसरे स्थान पर रहे थे.

कांग्रेस राजाराम पाल के पुराने सभी पापों को भूल गई और उसने कुर्मी और पाल बहुल सीट पर वोटों के समीकरण साधने के लिए राजाराम को अपना उम्मीदवार बना दिया. तो देश की जाबांज सेना के शौर्य पर सवाल खड़ा करने वाली कांग्रेस को इमरान मसूद और राजाराम पाल जैसों को अपना लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाने से शर्म क्यों आएगी?

(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)

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