डीयू में क्यों दाखिला चाहते हैं बिहारी नौजवान!

आरके सिन्हा

सारे देश के नौजवानों की यह दिली चाहत रहती है कि वे दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) में ही पढ़े. यहां के हिन्दू, सेंट स्टीफंस, मिरांडा हाउस, लेडी श्रीराम, श्रीराम कॉलेज आफ कॉमर्स, हंसराज वगैरह कॉलेजों की प्रतिष्ठा इतनी अधिक है कि ये नौजवान और नवयुवतियां इनसे जुड़ना चाहते हैं.

बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश वगैरह के विद्यार्थी तो खासतौर पर डीयू में दाखिला लेने की कोशिशें करते रहते हैं. बिहारी छात्र तो गुजरे 50-60 सालों से डीयू में दाखिला ले रहे हैं. अब अनेकों यहां पढ़ा भी रहे हैं. पर डीयू में दाखिला लेने की चाहत रखने वाले कम ही विद्य़ार्थियों को सफलता मिलती है.

इन कॉलेजों में किसी कोर्स के दाखिले के लिए नवोदित होनहारों को 12 वीं कक्षा में बहुत उम्दा प्रदर्शन करना होता है. जाहिर है कि इस स्थिति के कारण लाखों मेधावी छात्र भी लगभग हर वर्ष ही दाखिला पाने से वंचित रह जाते हैं.

अब डीयू में एडमिशन की पहली कट-ऑफ़ सूची जरी हुई है . ज्यादातर प्रमुख कालेजों में 100 में 99 प्रतिशत और 98 प्रतिशत वालों का ही नाम सूची में है . इससे लाखों बच्चे और अभिभावक निराश तो होंगे हीं .

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दूसरी ओर दिल्ली में बसे पले नौजवानों और उनके अभिभावाकों को यह गंभीर शिकायत रहती है कि बाहरी छात्रों को दाखिला देने के कारण डीयू में दिल्ली वासियों का हक मारा जाता है. दरअसल, डीयू एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, इसलिए इसमें अन्य प्रदेशों के मेधावी छात्र-छात्राएं तो आते रहेंगे.

इस बारे में शिकायत करने का कोई ठोस आधार तो नहीं बनता है. वैसे ही यह देश सबका है. यहां मेरा-तेरा तो कुछ नहीं होता. लेकिन, इस सारी समस्या का हल कैसे हो सकता है? मतलब यहां पर दाखिला सबको कैसे मिल सकता है? अगर डीयू में अधिक से अधिक बच्चों को दाखिला दिलवाना है तो एक पहल करनी होगी.

उसके बाद यहां पर हर कॉलेज में सीटों में भारी बढ़ोत्तरी हो जाएगी. पर यह तब ही मुमकिन है कि अगर डीयू के लगभग सभी कॉलेजों में सांध्य कक्षाएं चालू की जाएं. अभी गिनती के ही कॉलेजों में सांध्य कॉलेज भी चलते हैं. उनमें एक दिल्ली का जाकिर हुसैन कॉलेज है दूसरा दयाल सिंह कॉलेज.

बड़ा सवाल यह ही है कि इन 8-10 एकड़ में बने कॉलेजों के स्पेस और इनमें उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग कैसे मुमकिन है? फिलहाल तो अधिकतर कॉलेजों में दिन में 2-3 बजे तक सभी कक्षाएं समाप्त हो जाती हैं. उसके बाद कॉलेजों में सन्नाटा पसरने लगता है. क्यों नहीं शाम चार से आठ बजे के बीच सभी कॉलेज अपने यहां कम से कम कुछ कोर्स शुरू कर देते?

अगर हरेक कॉलेज में शाम के वक्त 300 छात्र भी आते हैं, तो समझ लीजिए कि हजारों अतिरिक्त नए छात्रों को डीयू में दाखिला मिल सकता है. देखिए अब तो दिल्ली में नए सिरे से किसी कॉलेज को चालू करना सरल नहीं है, क्योंकि कम से कम सात-आठ एकड़ का जगह हासिल करना ही लगभग नामुमिकन है. तो फिर आपके पास विकल्प ही क्या बचते हैं?

विकल्प यही है कि पहले से चल रहे कॉलेजों में सांध्य कॉलेजों को धीरे-धीरे शुरू किया जाए. एक समयबद्ध योजना के तहत पांच वर्षों में सभी कॉलेजों में शाम के वक्त भी सभी कक्षाएं चलें. साँध्य कॉलेज चालू करने का एक बड़ा लाभ यह भी होगा कि जो नौजवान दिन में कोई नौकरी करना चाहते हैं वे सुबह नौकरी करने के बाद शाम को पढ़ सकेंगे और दिन में पढ़कर शाम में कोई कम कर सकेंगें.

फिर अभी दिल्ली में रात में बारह बजे के बाद भी घर वापस जाने की भी दिक्कत नहीं रही है. दिल्ली मेट्रो रेल और डीटीसी बसें देर रात तक चलती हैं. उनसे आप आराम से अपने घरों में पहुंच सकते हैं.

उपर्युक्त प्रयोग से जहां हजारों छात्रों का डीयू में पढ़ने का ख्वाब पूरा हो जाएगा वहीं सैकड़ों अध्यापकों को भी रोजगार भी मिल जाएगा. जाहिर है कि जब सांध्य कॉलेज चालू होंगे तो अध्यापकों के साथ-साथ सहयोगी स्टाफ की भी आवश्यकता होगी. तब सैकड़ों नौजवानों को विश्वविद्यालय में ही अलग-अलग पदों पर रोजगार मिल सकेगा.

विश्वविद्यालय को भी शिक्षित और स्मार्ट सहयोगी सस्ते दरों पर मिल जायेंगे. विश्व के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में यही प्रक्रिया अपनायी जाती है. यानी सांध्य कॉलेजों को शुरू करने से लाभ ही लाभ हैं.

दरअसल दिल्ली यूनिवर्सिटी में बच्चे इसलिए दाखिला लेना चाहते हैं क्योंकि यहां पर शिक्षा सत्र समय के साथ चलता है. दूसरी बात यह है कि यहां से देश विदेश की शिखर हस्तियां पढ़कर निकली हैं. इससे भी तमाम युवा स्वाभाविक रूप से प्रभावित तो होते ही हैं.

अफ्रीकी देश मालावी के 2004-2012 तक राष्ट्रपति रहे बिंगु वा मुथारिका ने भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर 1961 से 1964 तक श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स से ग्रेजुएशन और फिर दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स ( डी स्कूल) से अर्थशास्त्र में अपनी मास्टर डिग्री हासिल की थी.

नोबेल पुरस्कार विजेता म्यांमार की शिखर नेता आंग सान सू की स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज से हुई . अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भी यहीं पढ़े .

दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज के दो छात्र आगे चलकर अपने-अपने देशों के राष्ट्रपति भी बने. भारत के पांचवें राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने भी यहां से ही अपनी शिक्षा ग्रहण की थी. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक सेंट स्टीफंस कॉलेज में 1941 से 1945 तक पढ़े.

इन शख्सियतों के अलावा भी डीयू से जीवन की तमाम क्षेत्रों की सफल हस्तियां निकलती ही रही हैं. दिल्ली स्कूल आफ इक्नोमिक्स (डी स्कूल) की तो सारे संसार में प्रतिष्ठा है. इसे एशिया का लंदन स्कूल आफ इक्नोमिक्स माना जाता है. डी स्कूल से प्रो. सुखमय चक्रवर्ती, डा. मृणाल दत्ता चौधरी, डा.ए.एल.नागर, प्रो.टीसीए अनंत, प्रो. अभिजीत बैनर्जी, डा. राम सिंह जैसे देश के प्रख्यात अर्थशास्त्री और आदरणीय अध्यापक जुड़े रहे हैं.

डी. स्कूल के संस्थापक निदेशक डा. वी.के.आर.वी.राव ने इससे देश के चोटी के अध्यापकों को जोड़ा था. उन्होंने यहां इस प्रकार की संस्कृति विकसित की ताकि इधर के गुरुओं और शिष्यों के बीच संवाद चलता रहे. डीयू से दर्जनों नामवर खिलाड़ी, एक्टर और कॉरपोरेट संसार की सफल शख्सियतें भी पढ़ी हैं.

बहरहाल ये महत्वाकांक्षी योजना उसी सूरत में बन सकती है कि अगर इस दिशा में सभी संबंधित पक्ष गंभीरता से विचार करें और फिर आगे बढ़े. सिर्फ घोषणाएं करने या बैठकें करने से तो कोई बात बनने वाली नहीं है.

यह समझना होगा कि सांध्य कॉलेजों को शुरू करने से कितने अधिक लाभ हो सकते हैं. पर इस समय एक जरूरत इस बात की भी है कि देश के सभी विश्व विद्लायों का स्तर डीयू की तरह का हो. सबमें में योग्य अध्यापक पढ़ाएं और विद्यार्थी पढ़े.

दोनों अपने धर्म का निर्वाह करें. पचास साल पहले तो पूरे भारत और एशियाई देशों के छात्र बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद कलकत्ता और मद्रास यूनिवर्सिटी की ओर भागते थे अब अरे डीयू की ओर भाग रहे हैं.

अभी देखने में आ रहा है कि बहुत से कॉलेजों के अध्यापक नौकरी मिलने के बाद पढ़ना और पढ़ाना छोड़ देते हैं. फिर वे कोई नए अनुसंधान पर काम तक नहीं करते. अध्यापकों को समझना होगा कि वे देश के निर्माता हैं. उन्हें अपने अध्यापक धर्म का सदैव निर्वाह करते रहना होगा. यदि वे यह नहीं करेंगे तो देश के अन्य कई विश्वविद्लाय भी डीयू जैसे ही बन जाएंगे.

(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)

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