क्या होगा गैर बीजेपी सरकारों का?

प्रभात ओझा

लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद गैर भाजपा सरकारों का भविष्य क्या होगा? इस पर सोचने के पर्याप्त कारण हैं.

पांच साल के अपने कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मामले में भले कुछ न किया हो, उनके पहले की केंद्र सरकारों ने राज्यों में विरोधी दलों की सरकार के साथ जो कुछ किया, उसे इतिहास सही नहीं ठहराता.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का गैर कांग्रेस सरकारों के साथ किया व्यवहार इतिहास के पन्नों में दर्ज है. हम और भी पहले चलते हैं और पंडित जवाहर लाल नेहरू से शुरू करते हैं.

उन्होंने देश में पहली बार किसी राज्य सरकार के खिलाफ कदम उठाया था. इतिहास गवाह है कि दुनियाभर में हिंसक क्रांति के बाद ही कोई कम्युनिस्ट सरकार बनीं.

इसके विपरीत हमारे यहां पहली चुनी हुई और इस तरह से दुनिया की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार ने पांच अप्रैल,1957 को केरल में शपथ ली थी.

ईएमएस नंबूदिरीपाद उसके मुख्यमंत्री बने. करीब दो साल बाद 31 जुलाई 1959 को देश विरोधी और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों के आरोप में नंबूदिरीपाद सरकार बर्खास्त कर दी गई.

इस तरह से संविधान लागू होने के एक दशक के अंदर ही अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल आजादी की लड़ाई से निकले नेहरू ने कर डाला. तब के राज्यपाल बीआर राव ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी थी.

सिर्फ इस एक उदाहरण को वर्तमान केंद्र सरकार अमल में ले आये तो कम से कम पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को तो रवाना किया ही जा सकता है.

राज्य के हालात पर केंद्र को रिपोर्ट देने का काम राज्यपाल का है. उस पर फैसला भी केंद्र सरकार के रुख के हिसाब से ही होगा. फिर भी आज पश्चिम बंगाल के हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते. 

लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं ने भाजपा समर्थकों को न सिर्फ डराया-धमकाया, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की भी रैली पर हमला कर जता दिया कि सरकार और सरकार के जरिए अपनी मनमानी के लिए किसी सीमा तक जा सकते हैं.

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 01-15 जून के अंक में…

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