विक्रमशिला व आचार्य दीपंकर की उपेक्षा क्यों

कुमार कृष्णन

प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शिक्षण केंद्रों में विक्रमशिला बौद्ध महाविहार का स्थान नालंदा व तक्षशिला से किसी भी स्तर पर कमतर नहीं था. 

इस बात का स्मरण होना चाहिए कि विक्रमशिला बौद्ध महाविहार ने करीब 400 वर्षों तक धर्म-संस्कृति की लौ को जलाए रखा. विक्रमशिला की विडंबना यह रही है कि अंग्रेजी शासन में ही नालंदा और तक्षशिला की खुदाई से विश्व इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक और शैक्षणिक विशिष्टताओं से अवगत हो गया.

लेकिन विक्रमशिला से दुनिया का परिचस 1970 के बाद हुआ. प्राचीन बौद्ध विहारों की श्रृंखला ​में विक्रमशिला महाविहार का स्थान बड़ा ही प्रमुख रहा है, जहां बौद्ध धर्म के दर्शन और ज्ञान का अध्ययन, मनन व अनुशीलन होता था.

इस महाविहार के संस्थापक पालवंशी राजा धर्मपाल थे. लामा तारानाथ के अनुसार इस महाविहार की स्थापना 769—809 ई ​के बीच हुई थी. पाल वंश के अन्य राजाओं के सहयोग से यह राजकीय विश्वविद्यालय हो गया.

दसवीं सदी से यह भारत का सबसे प्रमुख शिक्षा का केन्द्र बन गया और बारहवीं सदी के अंत तक बरकरार रहा, परंतु तेरहवीं सदी की शुरुआत से ही इस महाविहार का पतन हो गया. धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से यह भूमि में धंसता गया.

प्रसिद्ध इतिहासकार लामा तारनाथ (16वीं शताब्दी) ने अपनी पुस्तक “भारत में बौद्ध धर्म का इतिहास” में लिखा है कि विक्रमशिला महाविहार उत्तरी मगध में गंगा के किनारे एक छोटी सी पहीड़ी पर अवस्थित था. 

इसे प्रमाणित करने और स्थान निर्दिष्ट करने के लिए तरह-तरह के विचार हुए. सतीशचंद्र विद्याभूषण ने इसका स्थान सुल्तानगंज बताया. उनके मत का समर्थन राहुल सांकृत्यायन किया.

लेकिन अंग्रेज पर्यटक फ्रांसिस बुकानन ने वर्ष 1811 में अपने परिभ्रमण वृतांत में बताया कि भागलपुर स्थित कहलगांव से लगभग 11 किलोमीटर दूर पत्थर घट्टा के आसपास छोटे बड़े टीले हैं.

जो किसी राजमहल के ध्वंसावशेष हो सकते हैं. 1930 में सीई डब्लयू ओल्डहम ने बुकानन की डायरी को संपादित करते हुए अपनी प्रस्तावना में उल्लेख किया कि बुकानन ने पत्थर चट्टान के समीप किसी राजमहल के घ्वंसावशेष होने की जो संभावना व्यक्त की है.

संभव है कि यहीं विक्रमशिला बौद्ध महाविहार हो.

पूरा लेख नवोत्थान के जून अंक में…

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