वोकल फॉर लोकलः उत्तराखंड का ‘मधु ग्राम’ स्वरोजगार की मिसाल

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नैनीताल, उत्तराखंड।

नैनीताल जनपद का ज्योली गांव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ का सर्वश्रेष्ठ अनुकरणीय प्रतिमान हो सकता है. करीब 100 परिवारों की आबादी वाले इस गांव के लोग शहद के उत्पादन से जुड़ा हुआ है.

इस गांव के 50 फीसदी परिवार सीधे और बाकी 40 फीसदी परिवार भी परोक्ष तौर पर मधु यानी शहद के उत्पादन से जुड़े हैं. 6 महीने के शहद उत्पादन कार्य में मिलकर 50 टन तक शहद का उत्पादन कर लेते हैं. इस तरह प्रति परिवार दो से ढाई लाख रुपये तक कमा रहे हैं.

ये स्थानीय स्तर पर सैलानियों एवं स्थानीय लोगों को आज के मिलावट के दौर में भी शुद्ध शहद उपलब्ध कराते हैं, साथ ही डीलरों के माध्यम से विदेशों को निर्यात भी करते हैं. इसीलिए इस ग्राम को ‘मधु ग्राम’ तक कहा जाने लगा है.

हालांकि ग्रामीणों की उनके गांव को शासकीय दस्तावेजों में यह नाम दिए जाने की मांग अभी पूरी नहीं हुई है. हल्द्वानी-नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग पर मधु नगरी कहे जाने वाले ज्योलीकोट कस्बे से करीब 5 किमी दूर स्थित है ज्योली गांव.

गांव के पूर्व प्रधान एवं वर्तमान में प्रधान पति शेखर भट्ट बताते हैं करीब 1995 के आसपास गांव के उमेश भट्ट, उमेश पांडे, प्रमोद पांडे, कंचन पांडे व उन्होंने दो से 5 बाक्स से व्यावसायिक तौर पर मौन पालन की शुरुआत की थी. हालांकि वर्तमान में गांव में करीब 100 में से 50 परिवार सीधे तौर पर करीब ढाई से तीन हजार बाक्सों के जरिये मौन पालन कर रहे हैं.

ये लोग 6 महीने में यूपी के बरेली, बदायूं से लेकर राजस्थान होते हुए हल्द्वानी-रामनगर व चोरगलिया के ग्रामीण एवं जंगली क्षेत्रों में सरसों, लाही, लीची, शीशम, करी पत्ता, सूर्यमुखी आदि के बगीचों व वनों के पास अपनी मधुमक्खियों को ले जाकर मौन उत्पादन करते हैं.

मधुमक्खियां लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन की अनुपम मिसाल हैं. वे न केवल मधु एवं मोम का उत्पादन करती हैं, वरन फल एवं खाद्यान्न उत्पादन की मात्रा एवं गुणवत्ता में भी वृद्धि करने में सहायक होती हैं. हालांकि पहाड़ में परंपरागत तौर पर घरों में सदियों से मौन उत्पादन किया जाता रहा है.

लेकिन मौन पालकों की मानें तो पुराने दौर की भारतीय प्रजाति की मधुमक्खियां व्यवसायिक तौर पर मधु उत्पादन के लिए लाभदायक साबित नहीं होती हैं. इस लिहाज से यह भी मिथक ही है कि पहाड़ पर मधु उत्पादन की बेहतर संभावनाएं हैं, क्योंकि मौन पालकों के अनुसार पहाड़ भले फूलों के लिए जाने जाते हैं.

यहां के फूलों में मधु उत्पादन कम होता है. यहां तक कि राज्य वृक्ष बुरांश के शहद से भरपूर बताये जाने वाले फूलों से भी मधु मक्खियां शहद नहीं बना पाती हैं. इन्हीं कारणों से ज्योलीगांव के मौन पालकों को पहाड़ों की जगह यूपी से लेकर राजस्थान तक प्रवास करना पड़ता है.

फिर भी ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद पहाड़ से मौन उत्पादन का कार्य कर रहे हैं और दूर देश जाकर भी अपने गांव लौटते हैं और सुविधाविहीन होने के बावजूद स्वरोजगार का संदेश देते हैं. यह बड़ी बात है.

हिन्दुस्थान समाचार/नवीन जोशी