बुन्देलखण्ड: भारत के 1050 जलग्रामों के सृजन का प्रेरणास्रोत बना जलतीर्थ ‘जखनी’

HS - 2020-10-15T112406.464
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  • पानी सरकार का नहीं समाज का विषय: सर्वोदयी उमाशंकर पाण्डेय
  • आदर्श जलग्राम जखनी के बदलाव के मंत्र को जन-जन तक पहुंचाने में जुटे हैं सर्वोदयी पाण्डेय

महेश पटैरिया

भारत के पहले जलग्राम जखनी को नीति आयोग ने आदर्श जलग्राम घोषित किया है. इसी तर्ज पर जल संकट से जूझ रहे देश के 1050 गांवों को जखनी जैसा जलग्राम बनाने की घोषणा भी कर दी गई है. यही नहीं इस बात को दोहराते हुए पिछले वर्ष सरपंच को लिखे पत्र के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी गांवों में परम्परागत जल संरक्षण के तरीकों को अपनाने की अपील की है. सूखे से जूझ रहे बुंदेलखण्ड के बांदा जिले का जखनी गांव देशभर के लिए उदाहरण बन गया है.

जखनी ने जिस तरह स्वयं को बदला, देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिक उसका अध्ययन करने में जुटे हुए हैं. इस बदलाव के पीछे छुपे मंत्र खेत पर मेंड़, मेंड़ पर पेड़ को जखनी गांव के सर्वोदयी उमा शंकर पाण्डेय अब गांव-गांव जाकर हर किसान को बताने में जुट गए हैं. झांसी में हिन्दुस्थान समाचार से विशेष वार्ता के दौरान उन्होंने बताया कि पानी सरकार का नहीं समाज का विषय है और समाज के लोग आगे आकर ही इसे बचा सकते हैं.

भले ही जखनी गांव के किसानों के पास औपचारिक रुप से कोई डिग्री नहीं है. इसके इतर उनका इस सूखे की मार से जूझ रहे बुन्देलखण्ड में जल संरक्षण का मूल मंत्र खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ विश्वविद्यालय के किसी अनुसंधानकर्ता से कहीं अधिक शिक्षित और व्यवहारिक होने का प्रमाण है. नीति आयोग ने जिस जखनी जलग्राम को वर्ष 2019 में अपनी वाॅटर मैनेजमेंट रिपोर्ट में एक्सिलेंट परंपरागत माॅडल विलेज माना है. देश के 1050 जलग्राम स्थापित करने का श्रेय उसी जखनी गांव के हर किसान, नौजवान व मजदूर को जाता है. 20 वर्षों से पानी के लिए काम कर रहे सर्वोदयी उमाशंकर पाण्डेय बताते हैं कि पानी सरकार का नहीं समाज का विषय है.

उन्होंने न तो कोई एनजीओ बनाया, न किसी प्रकार की सरकारी ग्राण्ट की बाट जोही और न ही आज तक किसी पुरस्कार के लिए आवेदन किया है. आज से करीब 20 वर्ष पूर्व जखनी अपनी बदहाली के लिए जाना जाता था. लोग पलायन करने को मजबूर थे. तब उन्होंने बिना किसी संस्था के गांव के लोगों के साथ मिलकर फावड़ा हाथ में उठाया. अपने घर से निकलने वाली नालियों का रुख खेतों की ओर कर दिया. खेतों पर मेड़ बनाई. मेड़ पर पेड़ लगाए. तालाबों की सिल्ट को भी साफ किया. अपने कुओं को साफ किया और आज परिणाम देश के सामने है.

जल संरक्षण के इस सामूहिक प्रयास में न तो सरकार से कोई अनुदान लिया गया और न ही किसी नई मशीनी तकनीक का प्रयोग किया गया. गांव के किसानों, नौजवानों, बेरोजगारों ने फावड़ा उठाया. समय दिया, श्रमदान किया, मेड़बंदी की, गांव में जल रोका, गांव के पानी को जगाया, गांव को पानीदार बनाया और इस प्रकार अपने सबसे बदहाल गांव जखनी को देश का पहला जलग्राम बनाते हुए देश के 1050 जलग्रामों को जन्म देने की प्रेरणा बन गया.

सरकारें पानी के लिए बहा रही पानी की तरह पैसा

आचार्य विनोवा भावे के पदचिन्हों का अनुकरण करने वाले सर्वोदयी पाण्डेय बताते हैं कि देश के कई राज्यों में जल संकट तेजी से बढ़ रहा है. सरकार के पास आज तक इसका कोई स्थाई समाधान नहीं है. पानी बनाया नहीं जा सकता है केवल बचाया जा सकता है. हमारे आधे से अधिक परंपरागत जलस्रोत मृत प्रायः स्थिति में जा पहुंचे हैं. सरकारें इनको बचाने के नाम पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. पर पानी नहीं बचा पा रही हैं. केवल बुन्देलखण्ड में देश की यमुना, धसान, वेतवा, चम्बल, केन, सिंध व मंदाकिनी जैसी करीब 35 नदियां, 27 हजार तालाब, 60 हजार कुंए, 200 नाले, 150 बावड़ियां व 65 बांध होने के बाबजूद 40 लाख की कीमत देकर मालगाड़ी में भरकर दिल्ली से पानी मंगाया जाता हो इससे ज्यादा हास्यास्पद और क्या हो सकता है? जल संकट का कारण सरकारों द्वारा सामुदायिक कराते हुए जन समुदाय को कभी सरकारी जल योजना में शामिल ही नहीं किया.

एक नजर में जखनी गांव

बांदा जिला मुख्यालय से महज 14 किमी की दूरी पर स्थित महुआ ब्लाॅक में स्थित जलतीर्थ जखनी की आबादी करीब 2562 है. गांव में करीब 2472 बीघा कृषि योग्य भूमि है. गांव में 33 कुंए, 25 हैंडपंप, व 6 तालाब हैं. कुंओं का वाॅटर लेबल 20 फीट पर आ गया है. गांव के हित में दो नालों का भी महत्वपूर्ण योगदान है. गांव का गरीब से गरीब किसान भी करीब 50 हजार का धान पैदा करता है.

अब बुन्देलखण्ड के गांव-गांव तक पहुंच रही है बासमती धान

पाण्डेय ने बताया कि मेड़ से आशय मर्यादा का है. बांदा क्षेत्र धान के लिए उपयुक्त क्षेत्र है. धान वाॅटर लेबल को मैनेज कर रहा है. आज जखनी से चलकर बासमती धान बुन्देलखण्ड के हर गांव तक जा पहुंची है. उन्होंने बताया कि 2006-07 में गांव के 10 लोगों के साथ मिलकर उन्होंने 4000 कुन्तल बासमती पैदा किया था. दूसरे वर्ष में 100 लोगों ने धान बोया था और अब बुन्देलखण्ड के करीब करीब सभी गांवों तक बासमती धान जा पहुंचा है. पिछले वर्ष बांदा क्षेत्र में 10 लाख कुन्तल बासमती धान पैदा हुआ है.

अमेरिका की रिसर्च भारत व बुन्देलखण्ड पर थोपी जा रही

पाण्डेय बताते हैं कि उनके अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक गांव एक संसार के समान होता है. हर गांव के जीवनयापन का अपना तौर तरीका होता है. परंपरागत तरीकों को प्रयोग करते हुए गांवों के लोग जीवन यापन करते हैं. अब उन पर जबरन अमेरिका की रिसर्च को थोपा जा रहा है. जो काम जानते नहीं हैं,वह काम कराया जा रहा है. पानी समाज का कार्य है. यह सरकार का विषय नहीं है. इसके लिए कोई अनुदान भी नहीं मिलना चाहिए.

हिन्दुस्थान समाचार