व्यापारिक युद्ध की दिशा

बनवारी

लगभग आधी शताब्दी तक चीन के आर्थिक कायाकल्प में सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद अमेरिका ने उसके खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ दिया है. 

अमेरिका और चीन विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं. परिमाण की दृष्टि से अमेरिका पहले स्थान पर है और चीन दूसरे स्थान पर, लेकिन अमेरिका की तुलना में चीन की जनसंख्या भी अधिक है.

उसकी वार्षिक आर्थिक वृद्धि भी अधिक है. अब तक चीन अपने यहां कम्युनिस्ट शासन की एक शताब्दी पूरी होने पर 2049 में अमेरिका के समकक्ष होने का लक्ष्य लेकर चल रहा है. बहुत से अमेरिकी विशेषज्ञों को लगता है कि चीन यह लक्ष्य उससे पहले ही पा सकता है. 

इन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन अगर अपनी विशाल जनसंख्या को अमेरिकी जीवन स्तर उपलब्ध करने में सफल हो जाता है तो उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी. 

विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के लिए केवल अपने औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाना ही काफी नहीं होता. समृद्धि के साथ-साथ उसकी सुरक्षा की समस्या सामने आती है. 

इसलिए अगर चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है तो उसे विश्व की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति भी बनना पड़ेगा. वह उस दिशा में भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. 

अभी वह सामरिक उपयोग की प्रौद्योगिकी में अमेरिका से काफी पीछे है, लेकिन पिछले दिनों प्रौद्योगिकी के नए क्षेत्र में उसने जिस तेजी से प्रगति की है उसने अमेरिका को चौंका दिया है. 

अमेरिका को लगता है कि चीन की सामरिक क्षेत्र में हो रही यह प्रगति उसकी और उसके सहयोगियों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा कर सकती है. इसलिए पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका में यह धारणा पनप रही थी कि शक्तिशाली होने के चीन के इस अभियान को रोका जाना चाहिए. 

उसके लिए न केवल एक आक्रामक रणनीति आवश्यक थी बल्कि एक ऐसा नेता भी आवश्यक था जो अमेरिकी आक्रामकता का वाहक बन सके. डोनाल्ड ट्रम्प में अमेरिका को ऐसा ही नेता मिल गया है. 

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 16-31 जुलाई के अंक में…

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