Slogans

नई दिल्ली. इस समय पूरे देश में लोकसभा चुनाव की गहमा-गहमी है. आपको हर जगह हर दिन, हर पार्टी के अपने-अपने स्लोगन सुनने को मिल जाएंगे. कुछ स्लोगन अपनी छाप इस कदर छोड़ जाते हैं जो मन मस्तिष्क पर छप जाते हैं.

हमारे देश में बहुत से राजनीतिक दलों ने रचनात्मक नारों के आधार पर चुनाव भी जीते हैं. इन प्रभावशाली नारों के प्रति कई चुनावी जंग जीती गई हैं तो कई ने हारी भी हैं.

इस समय उत्तर प्रदेश में चुनावी प्रचार चरम पर है. एक दौर में यहां चुनावी नारों का चलन काफी ज्यादा रहा है. इनके बगैर यहां कोई चुनावी चर्चा पूरी नहीं होती थी.

चुनाव आते ही चारों तरफ नए-नए नारे छा जाते हैं. दरअसल चुनावी नारों का सिलसिला शुरुआत से ही चला आ रहा है. वेवर ने कहा था ‘नेता और उसके वादे प्रॉडक्ट की तरह हैं जिसे जनता के बीच लॉन्च किया जाता है.’

आइए जानते हैं हमारे देश में कौन-कौन से नारे ‘लॉन्च’ किए गए और जनता पर उनका क्या असर पड़ा. चुनावी नारों की भारत की राजनीति में बड़ी भूमिका रही है. जुमलेबाजी के इस दौर में एक निगाह डालते हैं उन नारों पर जो नेता से लेकर जनता के बीच काफी चर्चित रहे.

1- जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में, द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मरद गया नसबंदी में – आपातकाल और नसबंदी अभियान के खिलाफ ये नारा काफी चर्चित हुआ.
2- जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल (साठ के दशक में जनसंघ और कांग्रेस में नारों के जरिये खूब नोंकझोंक होती थी. जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक था जबकि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी थी.)
3- इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं (जनसंघ के ‘जली झोपड़ी भागे बैल यह देखो दीपक का खेल’ नारे के जवाब में कांग्रेस का ये जवाबी नारा था. जवाब में कांग्रेस ने ‘दीपक में तेल नहीं, तेरा मेरा मेल नहीं’ का नारा दिया था.इसलिए ये कोशिश कर रहे हैं कि देश में जैसे-तैसे खिचड़ी सरकार बन जाए.

4- खरो रुपयो चांदी को, राज महात्मा गांधी को (1952 में आजादी के बाद के पहले चुनाव में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने ये नारा दिया था)
5- संजय की मम्मी–बड़ी निकम्मी (1977 में इंदिरा के खिलाफ नारा लगाया गया था)
6- बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है (1977 में इंदिरा के खिलाफ नारा)
7- नसबंदी के तीन दलाल- इंदिरा, संजय, बंसीलाल (1977 में इंदिरा के खिलाफ नारा)
8- एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर (1978 में कर्नाटक के चिकमंगलूर से इंदिरा गांधी उप चुनाव लड़ रही थीं. उस दौरान दक्षिण भारत के कांग्रेसी नेता देवराज उर्स ने यह नारा दिया था.)
9- संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ (पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी के लिए समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया दिया गया नारा)
10- देश की जनता भूखी है यह आजादी झूठी है- आजादी के बाद कम्यूनिस्ट नेताओं द्वारा दिया गया नारा.

बहुत से राजनीतिक दलों ने रचनात्मक नारों के आधार पर चुनाव जीते हैं जबकि नारों के लोगों को प्रभावित न कर पाने की सूरत में कई दल हार गए हैं.