JAMIA के टीचर को मिली बड़ी उपलब्धि..

जामिया मिल्लिया इस्लामिया(JMI) के एसिस्टेंट प्रोफेसर को फैलोशिप दी गई है. JMI के सेंटर फॉर इंटरडिसप्लनेरी रिसर्च इन बेसिक सांइस में एसिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. मुहम्मद हसन ने ये उपलब्धि हासिल की है.

उन्हें ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी ऑफ बायोलॉजी (RSB) लंदन ने इस खास फैलोशिप के लिए चुना है. JMI के प्रोफेसर के लिए ये शानदार उपलब्धि है.

इसलिए मिलती है फैलोशिप

दरअसल बायोलॉजी साइंस के विकास में जिन लोगों का खास योगदान होता है, उन्हें सम्मान देने के लिए, रॉयल सोसाइटी ऑफ बाइआलजी अपने फैलो के तौर पर चुनती है. इसके लिए, चुने गए सदस्य को RSB की फैलोशिप दी जाती है.

कैंसर और न्यूरोडिजनरेटिव जैसे बीमारियों के थेरप्यूटिक मैनेजमेंट इस्तेमाल में, हाई अफिनिटी सेलक्टिव काइनेस इन्हिबीटर को इजाद करने के लिए ये सम्मान दिया जा रहा है.

ये हैं डॉ. हसन 

AIIMS से 2007 में Ph.d की डिग्री हासिल करने के बाद डॉ़. हसन ने JMI ज्वाइन करके अपने रिसर्च वर्क को आगे बढ़ाया. उन्होंने इंसानों में पाए जाने वाले असमान्य एंज़ाइम, काइनेस पर ही रिसर्च किया था.

उनकी पूरी रिसर्च इसी पर केंद्रित रही थी. उनके रिसर्च वर्क को देश विदेश की 220 से ज़्यादा रिसर्च पत्रिकाओं में छापा गया. इसके अलावा, उनके अनुसंधान कार्यों का 3500 से ज़्यादा जगह हवाला दिया गया.

काइनेस पर काबू पाने के लिए इजाद की गई दवाओं में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए, हाल ही में उन्हें फैलो ऑफ रॉयल सोसाइटी ऑफ केमस्ट्री के लिए चुना गया.

इससे भी अहम बात यह है कि वह, उन गिने चुने भारतीय वैज्ञानिकों में हैं, जिन्हें, बहुत कम उम्र में रॉयल सोसायटी ऑफ केमस्ट्री और रॉयल सोसायटी ऑफ बाइआलजी के लिए चुन कर, उनके रिसर्च वर्क को मान्यता दी गई.

वहीं इस उपलब्धि को हासिल करने के बाद डॉ़. हसन ने कहा कि रॉयल सोसायटी ऑफ केमस्ट्री और रॉयल सोसाइटी ऑफ बायोलॉजी में फैले के तौर पर शामिल किया जाना खुशकिस्मती की बात है. मैं खुद को सम्मानित महसूस कर रहा हूं. यह फैलोशिप बहुत बड़ा सम्मान है. अच्छा लग रहा है कि इस कडी मेहनत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है.

उन्होंने JMI को धन्यवाद देते हुए भी कहा कि यहां की बूनियादी सुविधाओं की बदौलत ही उन्होंने इस उपलब्धि को हासिल किया है.

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