संघ के मुरीद बन गए तकी रहीम

राजीव मिश्र

26 जून 1975 को इमरजेंसी के साथ ही इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आतंक का माहौल पैदा कर दिया था. आपातकाल लगते ही अखबारों पर सेंसर बैठा दिये गये. 

अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया. लेकिन, 72 वर्षीय जयप्रकाश नारायण का बिगुल जिस तरुणाई ने फूंका था, उसका परिणाम 22 महीने में ही आ गया. 

सरकार के काले कारनामों से त्रस्त जनता ने लोकतंत्र में आस्था जताते हुए 1977 में एकजुट होकर न केवल कांग्रेस, बल्कि इंदिरा गांधी को भी हरा दिया. 

आज इमरजेंसी को भुलाने की कोशिश की जाती है, लेकिन हमें उन काले दिनों के अनुभवों को नहीं भूलना नहीं चाहिए. उन अनुभवों से ही हम वो सबक सीखते हैं जिनसे हमारा लोकतंत्र और मजबूत बनेगा.

वाकया अविभाजित बिहार के मंडल कारा डाल्टनगंज (अब मेदिनीनगर, झारखंड) का है. इमरजेंसी में 22 महीने तक मीसाबंदी रहे अविभाजित बिहार के गणेश लाल अग्रवाल (जीएलए) कॉलेज (अब मेदिनीनगर, झारखंड) के भौतिक विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रो. कमला कांत मिश्र (केके मिश्र) बताते हैं कि पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदंबी प्रसाद यादव, त्रिपुरारी शरण (जेपी के पीए) सहित 175 राजनीतिक बंदी डाल्टनगंज मंडल कारा में मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) और डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल) के तहत बंद थे. 

इनमें संगठन कांग्रेस, सोशिलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशिलिस्ट पार्टी, समाजवादी, मुस्लिम लिग, जमायते इस्लामी के लोग शामिल थे. इन्हीं लोगों में वामपंथी विचारधारा के तकी रहीम भी थे. 

गिरफ्तारी के बाद डाल्टनगंज मंडल कारा आने के बाद शुरुआती दिनों में तकी रहीम अपने से मिलते-जुलते विचारधारा के बंदियों के साथ रहते थे. 

उन्हीं लोगों के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना और बात-विचार उनके होते थे. लेकिन, कुछ माह बीतते-बीतते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और जनसंघ के राजनीतिक बंदियों के आचरण उन्हें पसंद आने लगे. प्रो. केके मिश्र, शारदा प्रसाद श्रीवास्तव, एसएन लाल, रघुवीर सहाय आदि की बातें, विचारधारा उन्हें प्रभावित करने लगी. जेल में छह महीने से अधिक बीत चुके थे.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 07 जुलाई के अंक में…

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