अपने अन्दर के कुम्भ में करेंगे स्न्नान, तभी सफल होगा कुम्भ- डा.सोमा घोष

तीर्थराज प्रयाग में संगम की रेती पर कुम्भ मेला सबाब पर है. सोमवार से पौष पूर्णिमा के स्न्नान के साथ ही कल्पवास का अनुष्ठान शुरू हो गया है.

एक तरफ इस कुम्भ में जहाँ साधु संतों का समागम है वहीं संस्कृति और संगीत की धारा पिरोहने के लिये बड़े-बड़े संगीतज्ञों का जमावड़ा लगने लगा है. इसी कड़ी में मंगलवार को संगम तट पर पद्मश्री डॉक्टर सोमा घोष पहुंची जो शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम में भाग लेंगी.

संगम तट पर पहुंची लोक व शास्त्रीय गीत की मर्मज्ञ डा. सोमा घोष ने हिन्दुस्थान समाचार से ख़ास बातचीत में बताया कि कुम्भ तभी सफल होगा जब हम अपने अन्दर के कुम्भ में स्न्नान करेंगे. एक गीत की दो लाइने गुनगुनाते हुये उन्होंने ‘संगम के इस महायोग में जो कुम्भ नहाने आयेगा, इस अमृत बेला में वो भी अमृतमय हो जायेगा.

मंगलवार को शाम में होने वाले कार्यक्रम में वो संगम के ऊपर लिखे हुये कुछ गीत गायेंगी. विस्मिला खां की दत्तक पुत्री होने की बात आते ही उन्होंने अपनी पुरानी यादें साझा करते हुये कहा की पिता जी कहते थे सुर ही ईश्वर है.

जो लोग आजकल झगड़ते हैं आजकल वो बेसुरे हैं, हम मिलकर कुछ स्वर की बातें करें। शायद इस समाज में चल रहे झगड़े कुछ कम हो जायें. जिन्दगी में संस्कार के साथ संगीत की जरूरत है और संगीत से ही संस्कार मिलता है.

संगीत की कवितायें ही हमको संस्कार सिखाती हैं, यही एक माध्यम है, जिससे संस्कार को लोगों में जल्द समाहित किया जा सकता है।

घोष जी ने बताया की वो काशी में विस्मिला खां जी की स्मृति में एक संस्थान बनाएंगी अभी कुछ अटकलें हैं, जो शायद इस कुम्भ के बाद पूरी हो जाएं. उस संस्थान में वो बच्चों को लोकगीत के साथ ही संस्कार भी देने का काम करेंगी.

हिन्दुस्थान समाचार/अवनीश

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