बदजुबान सिद्धू हुए बेलगाम 

आर.के. सिन्हा

नवजोत सिंह सिद्धू बदजुबान तो पहले से ही थे, वे अब पूरी तरह बेलगाम भी हो चुके हैं. वे कांग्रेस के पक्ष में वोट मांगने के नाम पर समाज को तोड़ रहे हैं. वे एक भयानक खेल रहे हैं. 

उन्हें शायद खुद ही मालूम नहीं है कि वे अपनी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी से समाज और देश को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

अपने हालिया बिहार के दौरे के समय वे मुसलमानों से खुलेआम कह रहे थे कि इस क्षेत्र में उनकी ‘आबादी 64 फीसद है’ और यदि वे ‘मिल जाएं’ तो मोदी को ‘हरा सकते’ हैं. 

बसपा नेत्री मायावती ने भी सहारनपुर की सभा में इस तरह का आहवान किया है. पर सिद्धू तो बार-बार मुसलमानों को गोलबंद होने के लिए कह रहे हैं. 

याद नहीं आता कि कभी किसी ने इस तरह से, किसी धर्म विशेष के मतदाताओं का आहवान किया हो. वे उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में जाकर इमरान प्रतापगढ़ी के हक में भी मुसलमानों को वही सलाह देते हैं.

जो बिहार के कटिहार में जाकर दे आए थे. आखिर क्या वजह है कि क्रिकेटर से सियासत करने लगे सिद्धू मुसलमानों को भड़का रहे हैं? वे चाहते क्या हैं?

हैरानी इसलिए खासतौर पर हो रही है कि सिद्धू बोले ही चले जा रहे हैं. उन्हें कोई रोकने वाला ही नहीं है. लगता तो यही है, उन्हें कांग्रेस आला कमान से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपर्युक्त मिजाज की भाषणबाजी देने की अनुमति प्राप्त है? 

बिहार के कटिहार के आम अवाम ने नवजोत सिंह सिद्धू के विवादित बयान की निंदा की है. उसका मानना है कि सिद्धू को मज़हब के नाम पर राजनीति करने से बचना चाहिए. 

निश्चित रूप से धर्म के नाम पर राजनीति करना या वोट मांगना शर्मनाक है. यह संविधान निर्माताओं के ख्वाबों को चकनाचूर करने जैसा है. मैं बिहार की राजनीति को पिछले 50 सालों से देख रहा हूं, उसकी रिपोर्टिंग कर रहा हूं. 

मैं कह सकता हूं कि बिहारी वोटर उन नेताओं को खारिज करते हैं, जो समाज को तोड़ने वाली सियासत में यकीन रखते हैं. उनके लिए देश ही प्रथम है.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 12 मई के अंक में…

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