महान योगी

श्यामाचरण लाहिड़ी एक उच्च कोटि के साधक थे. जिन्होंने सद्गृहस्थ के रूप में योग की साधना में पूर्णता प्राप्त की थी. उनका जन्म बंगाल के नदिया जिले की प्राचीन राजधानी कृष्णनगर के निकट धरणी नामक ग्राम के एक संभ्रांत ब्राह्मण कुल में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा काशी में हुई बंगला, संस्कृत के अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी भी पढ़ी लेकिन कोई परीक्षा नहीं पास की.

श्यामाचरण लाहिड़ी एक उच्च कोटि के साधक थे. जिन्होंने सद्गृहस्थ के रूप में योग की साधना में पूर्णता प्राप्त की थी. उनका जन्म बंगाल के नदिया जिले की प्राचीन राजधानी कृष्णनगर के निकट धरणी नामक ग्राम के एक संभ्रांत ब्राह्मण कुल में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा काशी में हुई बंगला, संस्कृत के अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी भी पढ़ी लेकिन कोई परीक्षा नहीं पास की.


जीविकोपार्जन के लिए छोटी उम्र में सरकारी नौकरी में लग गए. वे दानापुर में मिलिटरी एकाउंट्स आफिस में थे. कुछ समय के लिए सरकारी काम से अल्मोड़ा जिले के रानीखेत गए. हिमालय की इसी उपत्यका में ही उन्हें गुरु की प्राप्ति और दीक्षा मिली.

उनके तीन प्रमुख शिष्य युक्तेश्वर गिरि, केशवानंद और प्रणवानंद ने गुरु के संबंध में प्रकाश डाला है. योगानंद परमहंस ने ‘योगी की आत्मकथा’ नामक जीवनवृत्त में गुरु को बाबाजी कहा है. दीक्षा के बाद भी इन्होंने कई वर्षों तक नौकरी की और इसी समय से गुरु के आज्ञानुसार लोगों को दीक्षा देने लगे थे.

एक बार जब वे रानीखेत में थे तो अवकाश के समय प्राकृतिक सौंदर्य का निरीक्षण करने पर्यटन पर निकले. इसी भ्रमण के दौरान उन्हें दूर से अपना नाम सुनाई दिया. और वे द्रोणगिरि नामक पर्वत पर चढ़ते-चढ़ते एक ऐसे स्थान पर पहुंच गए जहां थोड़ी-सी खुली जगह में अनेक गुफाएं थीं. वहीं एक गुफा के मुहाने पर उन्हें एक तेजस्वी युवक खड़े दिखाई पड़े. उन्होंने हिंदी में गुफा में विश्राम करने का संकेत किया.

उन्होंने कहा ‘मैंने ही तुम्हें बुलाया था’. इसके बाद पूर्वजन्मों का वृत्तांत बताते हुए शक्तिपात किया. बाबाजी से दीक्षा का जो प्रकार प्राप्त हुआ उसे ‘क्रिया योग’ कहा गया. क्रिया योग की विधि केवल दीक्षित साधकों को ही बताई जाती है. यह विधि पूर्णतया शास्त्रोक्त है और गीता उसकी कुंजी है.

गीता में कर्म, ज्ञान, सांख्य इत्यादि सभी योग हैं और वह भी इतने सहज रूप में जिसमें जाति और धर्म के बंधन बाधक नहीं होते. वे हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी को बिना भेदभाव के दीक्षा देते थे. इसीलिए उनके भक्त सभी धर्मों के मानने वाले थे.

वे अन्य धर्मावलंबियों से यही कहते थे कि आप अपनी धार्मिक मान्यताओं का आदर और अभ्यास करते हुए क्रिया योग द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। पात्रानुसार भक्ति, ज्ञान, कर्म और राजयोग के आधार पर व्यक्तित्व और प्रवृत्तियों के अनुसार साधना करने की प्रेरणा देते. उनके अनुसार, अपनी समस्याओं को हल करने का आत्मचिंतन से बढ़कर कोई मार्ग नहीं. सन 1880 में पेंशन लेकर वे काशी आ गए.

इनकी गीता की आध्यात्मिक व्याख्या आज भी शीर्ष स्थान पर है. इन्होंने वेदांत, सांख्य,
वैशेषिक, योगदर्शन और अनेक संहिताओं की व्याख्या भी की है. इनकी योग प्रणाली की
सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि गृहस्थ मनुष्य भी योगाभ्यास द्वारा चिर शांति प्राप्त कर योग के
उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हो सकता है. उन्होंने अपने सहज आडंबर रहित गार्हस्थ्य जीवन से
यह प्रमाणित कर दिया था.

साभार- युगवार्ता

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