महाराष्ट्र की उद्धव सरकार में क्यों पड़ रही है फूट!

Sanjay Raut
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नई दिल्ली. शिवसेना के मुखपत्र सामना में आज कांग्रेस पर हमला बोलते हुए तंज कसा गया है. पार्टी ने कांग्रेस की तुलना खटिया से की है और संपादकीय का शीर्षक दिया है ‘खटिया क्यों चरमरा रही है’

मुखपत्र सामना के संपादकीय पेज पर महाराष्ट्र के पूर्व सीएम अशोक चव्हाण और कांग्रेस नेता बालासाहेब थोरात को खरी खोटी सुनाई गई है. सामना में लिखा गया है कि कुछ पुरानी नेताओं में कुरकुर हो रही है. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार में अनबन नजर आ रही है.

सामना के संपादकीय में लिखा गया है, सरकार को कोई खतरा नहीं है. लेकिन सरकार में हमारी बात सुनी जाए. प्रशासन के अधिकारी नौकरशाही विवाद पैदा कर रहे हैं, हम मुख्यमंत्री से ही बात करेंगे.

सामना के संपादकीय में कहा गया, ‘राज्य के मामले में मुख्यमंत्री का फैसला ही आखिरी होता है, ऐसा तय होने के बाद कोई और सवाल नहीं रह जाता. शरद पवार ने खुद इसका पालन किया है. समय-समय पर मुख्यमंत्री से मिलते रहते हैं और सुझाव देते हैं. उनका अनुभव शानदार है.’

कांग्रेस के बारे में शिवसेना ने लिखा है कि कांग्रेस पार्टी भी अच्छा काम कर रही है, लेकिन समय-समय पर पुरानी खटिया रह-रहकर कुरकुर की आवाज करती है. खटिया पुरानी है लेकिन इसकी एक ऐतिहासिक विरासत है.

लेख में कहा गया है कि उद्धव ठाकरे ऐसे नेता नहीं हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे. हर किसी के गले में मंत्री पद का हार है. ये नहीं भुलाया जा सकता है कि इसमें शिवसेना का त्याग भी महत्वपूर्ण है. संपादकीय में आगे कहा गया है कि उसी खटिया पर बैठे अशोक चव्हाण ने भी एक साक्षात्कार दिया और उसी संयम से कुरकुराए.

सामना ने लिखा कि इस पुरानी खाट पर करवट बदलने वाले लोग भी बहुत हैं, इसलिए ये कुरकुर महसूस होने लगी है, मुख्यमंत्री ठाकरे को ऐसी कुरकुराहट महसूस करने की तैयारी रखनी चाहिए. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का कुरकुराना संयमित होता है. घर में भाई-भाई का झगड़ा होता है यहां तो तीन दलों की सरकार है.

ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या महाराष्ट्र सरकार में सभी दलों के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है या नहीं. वहीं, बीजेपी ने भी सामना के संपादकीय का हवाला देते हुए गठबंधन सरकार पर हमला बोला है. बीजेपी नेता राम कदम ने कहा कि कहा कि इन्हें (सरकार) महाराष्ट्र में कोरोना की वजह से जान गंवाते लोगों की फिक्र नहीं है, बल्कि कुर्सी की चिंता सताई जा रही है.