काशी में शंकराचार्य

अर्जुन तिवारी

काश से निर्मित काशी में संत महात्माओं का मन बरबस ही रम जाता है. मोह माया से मुक्त तमाम संतों ने काशी को अपनी तपस्थली बना ली.

यहां की आबोहवा के साथ सामन्यस्य बिठाकर अपने आराध्य की भक्ति करते हैं. ऐसे बहुत से संत हुए, जिन्होंने दूसरी जगह आकर यहां अपना निवास बनाया और तपस्यारत रहे.

ऐसे भी अनेकों योगी हुए जो इस पावन नगरी को किन्हीं कारणों से अपना स्थाई निवास नहीं बना सके, लेकिन समय-समय पर काशी यात्रा करते रहे.

भारतीय संस्कृति के समुद्धार तथा संरक्षण के निमित गोविंदा भगवत्पाद ने शंकर को आदेश दिया, ‘तुम्हें वैदिक धर्म के प्रचार हेतु काशी धाम जाना है.

भवानीपति शंकर के दर्शन लाभ कर उनके आदेशानुसार अपना मार्ग प्रशस्त करो. जो कुछ मुझसे विद्या प्राप्त की है, वहां जाकर दूसरों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास करो.

अब तुम्हारे जीवन का एक ही लक्ष्य होना चाहिए- वैदिक धर्म का प्रकाश जनसाधारण तक पहुंचे.’ इस आदेश के अनुपालन में आचार्य शंकर काशी पहुंचे तथा मणिकर्णिका घाट पर रहने लगे.

वहां सर्वप्रथम अन्नपूर्णा का दर्शन कर शंकराचार्य ने एक अनोखी भिक्षा मांगी- ‘अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्रणवल्लभे. ज्ञान-वैराग्य-सिद्ध्यर्थं भिक्षा देहि च पार्वति.’ अर्थात- अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान प्राणवल्लभा है पार्वती.

आप मुझे वही भिक्षा दीजिए जिससे मुझे ज्ञान-वैराग्य की सिद्धि प्राप्त हो. अन्नपूर्णा के इस प्रणाम मंत्र द्वारा उन्होंने ज्ञान-वैराग्य की सिद्धि की भीख मांगी.

शंकराचार्य के आगमन काल में अन्नपूर्णा मंदिर की अवस्थिति पर मतान्तर है.‘काशी खंड’ में अन्नपूर्णा का उल्लेख नहीं है. अनेक ग्रंथों में उल्लेखित है कि भवगेहिनी भवानी देवी काशीवासियों को भिक्षा के रूप में मोक्ष प्रदान करती है.

आचार्य शंकर ने ‘गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि’ द्वारा भवानी के चरणों में शरणागति की याचना की है. देवी भवानी और अन्नपूर्णा एक ही देवी के नाम हैं. ‘काशी खंड’ के अनुसार भवानी मंदिर के निकट उत्तर-पूर्व कोने पर ज्ञानवापी है. अनेक प्राचीन ग्रंथों में ‘अन्नपूर्णा भवानी’ की चर्चा मिलती है. शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रह सन्धौ. भव समचित्त: सर्वत्र त्वं, वाझ्छस्यचिरा द्यदि विष्णुत्वम्.

अर्थात- शत्रु-मित्र, पुत्र-बंधु में अनुराग या विराग न रखो. यदि तुम शीघ्र ही विष्णु पद पाना चाहते हो तो सभी में सर्वत्र समानता की भावना रखो.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के मई अंक में…

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