SC ने खारिज की नागालैंड में इनर लाइन परमिट नियम के खिलाफ याचिका

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने नगालैंड (Nagaland) समेत देश के कुछ हिस्सों में जाने के लिए इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit) लेने की व्यवस्था के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि इनर परमिट के नियम को बनाए रखने या हटाने के बारे में निर्णय लेना सरकार का अधिकार है. इस मसले पर कोर्ट विचार नहीं कर सकती है. 

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई,जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि हम इस मामले पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं.

याचिका बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि इनर लाइन परमिट की व्यवस्था से राज्यों को नागरिकों की आवाजाही पर नियंत्रण करने का असीमित अधिकार मिल जाएगा. इस व्यवस्था से संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन होता है.

याचिका में कहा गया है कि नागालैंड में केवल आठ फीसदी हिंदू आबादी है और राज्य में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट का प्रावधान करना संविधान की भावना के खिलाफ है.

याचिका में उपाध्याय ने कहा है कि पत्रकारों को भी राज्य में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट लेने की जरूरत होती है. ये प्रावधान अर्ध-वीसा व्यवस्था की तरह है. उपाध्याय ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि राज्य द्वारा भारतीय नागरिकों के लिये इनर लाइन परमिट जैसी व्यवस्था लागू करने के विघटनकारी नतीजे हो सकते हैं और इससे अंतरराष्ट्रीय जगत में देश की गलत छवि पेश होती है.

याचिका के अनुसार इनर लाइन परमिट की वजह से देश के किसी भी हिस्से में नागिरकों के निर्बाध तरीके से आने जाने के मौलिक अधिकार का हनन होता है और इससे विकास तथा निवेश प्रभावित होता है.

कहां लागू है ये नियम?

ये नियम फिलहाल पूर्वोत्तर भारत के तीन खूबसूरत राज्य मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश एवं नागालैंड में लागू है. इसके अलावा लेह-लद्दाख में भी ये लागू होता है.

क्यों बनाया गया ये नियम?

भारत के सीमावर्ती राज्यों एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्र बेहद संवेदनशील जोन में आते हैं. जिस कारण यहां किसी नागरिक की पहचान के लिए इसे एक सही तरीका माना जा सकता है.

हिन्दुस्थान समाचार

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