Sachin Pilot के पिता भी हो गए थे बागी, पर नहीं छोड़ी थी Congress

मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में कांग्रेस का सियासी खेल बिगड़ता नजर आ रहा है. डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बागी तेवरों से गहलोत सरकार खतरे में पड़ गई है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके डिप्टी सचिन पायलट के बीच शह-मात का खेल नया नहीं है.

विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट ने खूब मेहनत की. लेकिन सत्ता की मलाई गहलोत को खाने को मिली. गहलोत और पायलट के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है. इससे पहले गहलोत और सीनियर पायलट यानी सचिन के पिता राजेश पायलट के बीच में भी हमेशा छत्तीस का आंकड़ा ही रहा.

सीनियर पायलट ने उस दौर के युवा गहलोत के बजाय उस समय प्रदेश की राजनीति में अपना वर्चस्व रखने वाले वरिष्ठ नेताओं का साथ दिया. उन्होंने गहलोत को कभी नहीं गांठा. आज जिस तरह से सचिन ने बगावती रुख अख्तियार किया है, बरसों पहले उनके पिता स्वर्गीय राजेश पायलट भी इसी तरह से बागी हो गए थे. हालांकि उन्होंने जीवन के आखिरी वक्त तक कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा था.

गांधी परिवार से हो गए थे खफा

राजेश पायलट ने एक बार कांग्रेस आलाकमान से नाराज होकर कहा था कि पार्टी में कोई जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं रही. बस कुर्सी को ही सलाम किया जा रहा है. एक बार तो बात यहां तक पहुंच गई जब राजेश पायलट ने सीधे गांधी परिवार को भी चुनौती दे डाली थी. राजेश पायलट की राजनीति में एंट्री सीधे गांधी परिवार के जरिए ही हुई. पायलट होने के नाते उनकी नजदीकियां संजय गांधी से काफी ज्यादा थीं. इंदिरा के समय संजय गांधी की पार्टी में खूब चलती थी.

पार्टी में टिकट देने का काम संजय गांधी ही देखते थे. लिहाजा साल 1980 में सीनियर पायलट को राजस्थान की भरतपुर लोकसभा सीट से मौका मिला और वे चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए. केंद्र की सत्ता में भी पायलट को पूरा मौका मिलता रहा. संजय गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी से भी सीनियर पायलट की खूब पटी.

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में खूब उथल-पुथल मची. जिसके बाद राजेश पायलट भी कई मौकों पर अपने तेवर दिखाते रहे. साल 1997 में उन्होंने सीताराम केसरी के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ा. इस दौर में शरद पवार भी कांग्रेसी थे. पवार ने भी अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा. हालांकि राजेश पायलट और शरद पवार दोनों ही चुनाव हार गए थे.

राजेश के बागी तेवरों को देखते हुए धीर-धीरे उनको साइड किया जाने लगा. कांग्रेस को बिखरता देख सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा. साल 1997 में सोनिया ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की, और 1998 में कांग्रेस की बागडोर अपने हाथों में ले ली. 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई. सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा होने लगी, लेकिन शरद पवार, राजेश पायलट और तारिक अनवर जैसे दिग्गज नेताओं ने गेम बिगाड़ दिया.

बगावती तेवर से पार्टी परेशान थी

अब तक राजेश पायलट पूरी तरह से बागी हो चुके थे. साल 2000 में जब जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, तो सीनियर पायलट ने जितेंद्र प्रसाद का समर्थन किया. कयास लगाए जाने लगे कि सीनियर पायलट कभी भी कांग्रेस छोड़ सकते हैं. और बीजेपी का दामन थाम सकते हैं या शरद पवार की तरह अपनी कोई पार्टी बना सकते हैं. लेकिन 11 जून 2000 को एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. और वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी ही बने रहे.

Leave a Reply

%d bloggers like this: