पित्रोदा मांगते सुबूत, खुश होगा पाक

अब कांग्रेस के वैज्ञानिक दिमाग के नाम से सुविख्यात सैम पित्रोदा ने भी भारतीय वायु सेना से पाकिस्तान में आतंकियों के ठिकानों को तबाह करने के सुबूत मांगे हैं.

कभी राजीव गांधी के खासमखास करीबी रहे पित्रोदा आजकल राहुल गांधी के भी मुख्य सलाहकार बने हुए हैं. अमेरिका में लंबे समय से बसे हुए पित्रोदा अब देखना चाहते हैं, भारतीय वायुसेना के हमले में 300 से अधिक आतंकियों के मारे जाने के ठोस साक्ष्य.

पित्रोदा ने कहा “पाकिस्तान से आए कुछ लोग” यदि आतंकी वारदात अंजाम देते हैं तो उसकी सजा पूरे पाकिस्तान को क्यों दी जा रही है? कितने भोले बन रहे हैं पित्रोदा जी. क्या उन्हें पता नहीं कि पाकिस्तान सेना और सरकार ही पालती है आतंकियों को?

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने एक साक्षात्कार के दौरान यह खुले तौर पर माना भी था कि उनके कार्यकाल में भारत पर जैश-ए-मोहम्मद से आतंकी हमले करवाया जाता था पाकिस्तान के बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के द्वारा.

क्या पित्रोदा को ये भी यकीन नहीं है कि मुंबई हमले में भी पाकिस्तान के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन लिप्त थे? क्या उन्हें इतना भी याद है कि दुनिया सबसे खूंखार आतंकी ओसमा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान के शहर बहावलपुर से ही उठाया था?

पित्रोदा अनेक वर्षों से अमेरिका में बसे हुए हैं. क्या अमेरिकी सरकार से वहां का कभी कोई शख्स ओसामा को उसके ठिकाने से उठाने से लेकर समुद्र में फेंकने के साक्ष्य मांगता है? क्या वे यह साक्ष्य अमेरिका में मांगने की हिम्मत कर सकते थे? क्या वहां किसी ने भी यह पूछा था कि ओसामा को दुनिया के किस भाग के समुद्र में फेंका गया था? नहीं न? पर पित्रोदा साहब तो बेशर्मी से बालाकोट में की गई कार्रवाई के सुबूत मांग रहे हैं. जरूर मांगिए. मांगते रहिए. आपकी और आपके मालिक और मालकिन और उनके समस्त चाटुकार मण्डली की हरकतों को देश देख रहा है.

अब जरा पित्रोदा साहब लगे हाथ यह भी बता दें कि उन्होंने तब सुबूत क्यों नहीं मांगे थे जब भारतीय सेना ने म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक किया था? क्या तब सरकार ने उन्हें सुबूत दे दिए थे? अगर नहीं दिए थे, तो उन्होंने मांगे क्यों नहीं थे?

पित्रोदा के बयान को सुनकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और समस्त आतंकवादी मण्डली जरूर खुश हो रहे होंगे. इस मौके पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी अति प्रसन्न होंगे. वहां के घोर भारत विरोधी नेता भी खिलखिला रहे होंगे जो भारत पर एटमी हमला करने की धमकी देते रहते हैं.

उन्हें समझ में आ रहा होगा कि भारत में अभी भी पाकिस्तान समर्थक गद्दार फल-फूल रहे हैं. जिस पाकिस्तान को सारी दुनिया आतंक की फैक्ट्री मानती है, उसे मासूम देश होने का प्रमाणपत्र कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके खासमखास लोग लगातार दिए जा रहे हैं.

क्या पित्रोदा को परवेज मुशर्रफ की उस स्वीकारोक्ति की जानकारी नहीं है, जिसमें वे साफ बताते हैं कि पाकिस्तान सरकार आतंकियों को खाद-पानी देती है? मुशर्रफ की स्वीकृति से ही पाकिस्तान का असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया था. यह कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान आतंकियों का सुरक्षित घर है.

क्या पित्रोदा को यह भी यकीन नहीं है कि मुंबई हमलों के हमलावर पाकिस्तानी थे? अजमल कसाब पाकिस्तानी नहीं था? भारत उस भयानक हमले के लिए पाकिस्तान को दोषी मानते हुए साक्ष्य देता रहा है पर पित्रोदा को जरूर लगता होगा कि उस हमले के लिए पाकिस्तान से आए आतंकी दोषी नहीं है.

अगर वे मानते हैं कि मुंबई हमलों के लिए पाकिस्तान ही जिम्मेदार है, तब इमरान खान से जरा यह भी पूछ लें कि वे मुंबई में 26/11 को हुए भयानक हमले के दोषियों को सजा कब तक दिलवा देंगे?
उस भयावह आतंकी हमले को 10 साल हो चुके हैं, पर पाकिस्तान उस हमले के मास्टरमाइंड आतंकियों को सजा दिलवा नहीं पाया है. वो खुलेआम पाकिस्तान का दामाद बना फिर रहा है.
क्या पित्रोदा को मालूम है कि इमरान खान ने मुंबई हमलों में मारे गए लोगों के परिजनों से कभी संवेदना तक नहीं जताई है?

पूर्व पाकिस्तान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी माना था कि मुंबई में 2008 में हमला पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकियों ने ही किया था. शरीफ ने कहा था कि मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए बड़े आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ था. शरीफ के कबूलनामे से इमरान खान इतने नाराज हो गए थे कि उन्होंने नवाज शरीफ को “मीरजाफर” की उपाधि से नवाज दिया था.

पित्रोदा साहब, आपको तो मालूम ही होगा कि अभी कुछ दिनों पहले ईरान के सुरक्षाकर्मियों पर आतंकियों ने हमला किया था जिसमें ईरान के 30 से ज्यादा सिपाही मारे गए थे. उसके बाद हमलावर फायरिंग करते हुए पाकिस्तान की सरहद के अन्दर अपने सुरक्षित पनाहगार में चले गए थे.

ईरान ने भी हमले के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को ही जिम्मेदार माना था. बहरहाल, सारा देश देख रहा है कि बालाकोट हमले के साक्ष्य मांगने वाले बेहया रूप से मुखर हैं. क्या दुश्मन के घर में लड़ाकू विमान भेज देना ही बहुत साहसिक फैसला नहीं है? वह भी एल ओ सी के पार. इस तथ्य की पुष्टि खुद पाकिस्तान कर रहा है.

क्या सांप के मुंह में हाथ डालकर दांत गिनना साहस का काम नहीं है? भले ही आपने उसके दांत नहीं तोड़े हो! यह घोर शर्म की बात है कि सेना कार्रवाई के सफल रहने की बात चीख-चीख कर कह रही है, पर पित्रोदा और अरविंद केजरीवाल जैसे पढ़े-लिखे विद्वान उस एक्शन पर उंगली उठा रहे है.

इन्हें अपनी सेना भी झूठी लग रही है. आखिर आप सब क्या कर रहे हैं? क्या आप नहीं मानते कि पाकिस्तान सबूत मिटाने में उस्ताद देश है? जो देश मिनटों में अपनी पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का खून धोकर साक्ष्य मिटा सकता है, वह आपका सबूत भला क्यों बचाकर रखेगा ? और अगर हमारी कार्रवाई खोखली थी तो फिर पाकिस्तान में इतनी खलबली ही क्यों है और इमरान की सेना हमारी ओर लड़ाकू विमान भेजकर बदले की कोशिश क्यों कर रही थी जिसे वीर अभिनन्दन ने मर गिराया.

दरअसल, देश में एक दंगाई रोग चला है बेहयाई और बेशर्मी का जो सिर्फ सियासत से प्रेरित होकर हमारे सभी संस्थानों को मोदी विरोध की रुग्ण सोच की आड़ में सवालों के घेरे में रखती है? ये सारी दुनिया जानती है कि हरेक देश की विदेश नीति और युद्ध नीति एक होती है. उसका इस बात से कोई मतलब नहीं होता है कि देश में सरकार किस दल की है. पर ये छोटी सी बात को भारत में कुछ निहित स्वार्थ से भरे लोग भूल गए हैं. ये दुश्मन के साथ खड़े हैं. इनके लिए सत्ता में आना देश की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है. देश को इन कथित राष्ट्रद्रोहियों को इसी चुनाब में पहचान भी लेगा और नकार भी देगा.

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