क्यों सरकारी घरों में दशकों जमे रहते हैं नामवर कलाकार

RK Sinha
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एक बात यह तो समझ ली जाए कि सरकारी घरों पर किसी को भी अनिश्तिकाल तक रहने की अनुमति तो नहीं ही दी सकती. मंत्रियों, सांसदों, नौकरशाहों को अपने पद से मुक्त होने के बाद सरकारी आवास तो नियत समयावधि में छोड़ना ही होता है. इस तरह के ही नियम कलाकारों और पत्रकारों पर भी लागू होते हैं. उन्हें भी सरकार अनिश्चित काल के लिए कोई सरकारी आवास तो नहीं दे सकती.

अब सरकार ने कत्थक नृत्य गुरू बिरजू महाराज, चित्रकार जतिन दास समेत  27 कलाकारों से कहा है कि वे अपने सरकारी आवासों को शीघ्र खाली करें. ये सब इनमें दशकों से रह रहे हैं. बिरजू महाराज पॉश इलाके शाहजहां रोड के शानदार फ्लैट में लगभग आधी सदी से रह रहे हैं. सवाल यह है कि आखिऱ सरकार कब तक किसी को सरकारी आवास दे सकती है? कुछ लोग कह रहे हैं कि सरकार का यह कदम कठोर है. सरकार को इन कलाकारों को रहने के लिए कुछ समय और देना चाहिए था.

“कुछ” कहने वाले बतायें कि कितना?  इस सवाल का तो कोई उत्तर नहीं देता है. क्या दशकों से लेकर आधी सदी का समय कम है? आखिर ये सब भी ठीक-ठाक कमाते हैं. अगर कमाते हैं तो फिर इन्हें अपने घरों को बनवाने या उनमें जाने में क्या दिक्कत है? कहना न होगा कि अपना घर बनवाने से इनके जीवन में स्थायित्व भी आता. वास्तविकता तो यही है कि इनमें से लगभग सबों के अपने घर भी दिल्ली में हैं जो किरायों पर लगा रखे हैं.

बिरजू महाराज एक महान कलाकार हैं. इस संबंध में कोई  बहस नहीं हो सकती. इन्होंने कथक नृत्य में नये आयाम जोड़कर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. इसके अलावा इन्होंने विश्व पर्यन्त भ्रमण कर हजारों नृत्य कार्यक्रम करने के साथ-साथ कथक शिक्षार्थियों के लिए हजारों कार्यशालाएं भी आयोजित की हैं. वे नई दिल्ली स्थित भारतीय कला केन्द्र, जिसे बाद में कथक केन्द्र कहा जाने लगा, के अध्यक्ष भी रहे. वहां से 1998 में सेवानिवृत्त होने पर अपना नृत्य विद्यालय कलाश्रम भी दिल्ली में ही खोला. क्या इतना सब कुछ करने के बाद वे दिल्ली में अपना एक घर नहीं बना सके?  यह तो कोई विश्वास ही नहीं करेगा.

जतिन दास भी श्रेष्ठ चित्रकार है. हालांकि उन पर कागज का उत्पादन करने वाली एक कंपनी की सह संस्थापक महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप भी लगाया था. अगर जतिन दास पर लगे इन आरोपों की तफ्तीश न भी की जाए तो भी यह सवाल तो पूछा जाएगा कि वे क्यों सरकारी घर में लगातार रहना चाहते हैं? क्या जो कलाकार नहीं है, वे देश के नागरिक नहीं है. क्या वे देश के निर्माण में योगदान नहीं दे रहे? विकास में योगदान के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स नहीं भर रहे ? ये सब सवाल वाजिब है.

ध्रुपद शैली के शास्त्रीय गायक वासिफुद्दीन डागर से भी अपना सरकारी आवास खाली करने को कहा गया है. वे उस्ताद नासिर फैयाजुद्दीन डागर के पुत्र हैं. अपने पिता की मृत्यु के बाद और बाद में अपने चाचा की मृत्यु के बाद वासिफुद्दीन ध्रुपद शैली के अकेले गायन कर रहे हैं. उन्हें 2010 में “पद्म श्री” से सम्मानित किया गया. सवाल वही है कि इन आदरणीय कलाकारों ने अपना घर क्यों नहीं बनाया? और, यदि बनाया है तो फिर वहां क्यों नहीं रहते. लुटियन दिल्ली में ही डेरा दल रखना ही इन्हें क्यों भाता है. अगर घर बना लिया तो ये वहां शिफ्ट क्यों नहीं करते? इन सबको यह गलतफहमी कैसे हो गई कि ये सरकारी घरों में जीवनभर रह सकते हैं. यह तो सच में बहुत ही गलत प्रवृति है.

एक दौर में कुछ नेता चुनाव हारने के बाद भी अपने सरकारी घरों को छोड़ने से कतराते थे, पर अब यह सब नहीं होता. केन्द्र में मोदी सरकार के 2014 में बनने के बाद अब सब कुछ नियमों से तय होता है. चौधरी अजीत सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनावों में हारने के बाद 12 तुगलक रोड के अपने आवास को खाली करने में बहुत बखेड़ा खड़ा किया था. उन्हें बाद में सरकार ने बंगले से निकाला था.

सुप्रीम कोर्ट ने 5 जुलाई, 2013 के अपने एक फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि मंत्री/सांसद न रहने के एक माह के भीतर सरकारी आवास खाली कर दिया जाना आवश्यक है. जैसा कि नियम है, हारे हुए सांसदों को एक माह के भीतर अपने सरकारी आवासों को संपदा निदेशालय के अधिकारियों को सौंपना होता है. पर इनकी भी कुछ मजबूरियां तो हो ही सकती हैं. इसलिए इनसे अपेक्षा रहती है कि वे यदि एक माह से अधिक समय तक सरकारी बंगले में रह रहें तो वे लोकसभा के स्पीकर की अनुमति ले लें और मार्केट रेंट अदा करें. अब यह हो भी रहा है. ऐसा न करने वाले सांसदों / मंत्रियों के पेंशन भी रोके जा रहे हैं, ऐसी सूचना मिली है.

दरअसल एक बार राजधानी के नई दिल्ली क्षेत्र की आवासीय कॉलोनियों में रहने के बाद वहां से निकलना आसान तो नहीं होता. हरियाली से लबरेज नई दिल्ली में रहने वालों को विश्व स्तरीय सुविधाएं मिल जाती हैं. इधर श्रेष्ठ स्कूल, अस्पताल, उद्यान, बाजार वगैरह सभी सुविधायें उपलब्ध हैं. आपको सारे भारत में इतना व्यवस्थित इलाका शायद ही कहीं मिले. इधर प्रदूषण नहीं के बराबर ही रहता है. देश के कर्णधार  भी यहां पर ही रहते हैं. जाहिर है इन तमाम वजहों के बाद सरकारीं घरों में रहने वाले बहुत से लोग ये ही कोशिश करते हैं कि वे इधर ही जमे रहें. पहले यह पहुँच रहने पर हो भी जाता था. पर अब तो सबको नियम से ही चलना पड़ता है. नियम कहता है कि जायज है तो रहो और नियम का उल्लंघन हो रहा है तो बाहर जाने की तैयारी कर लो.

अब बिरजू महाराज, जतिन दास और डागर वगैरह को बाबा साहेब अंबेडकर से  प्रेरणा लेते हुए अपने सरकारी घरों को फौरन छोड़ ही देना चाहिए. अगर आप इतिहास के पन्नों को पलटें तो आपको पता चलेगा कि डा. भीमराव अंबेडकर ने पंडित नेहरू की कैबिनेट से 27 सितंबर, 1951 को इस्तीफा दे देने के अगले ही दिन अपने आवास को 26 अलीपुर रोड में शिफ्ट कर लिया था. यानी वे कैबिनेट मंत्री का पद छोड़ने के बाद एक दिन भी 22 पृथ्वीराज रोड के आलिशान सरकारी बंगले में नहीं रहे. बाबा साहेब चाहते तो 22 पृथ्वीराज रोड पर कुछ महीनों तक तो मजे से रह ही सकते थे. पर वे नहीं माने. इसलिए ही आज सारा देश उनका सम्मान करता है.

 देखिए सरकारी सुविधाओं का किसी भी सूरत में गलत तरीके से इस्तेमाल तो नहीं ही होना चाहिए. पर बहुत से सरकारी बाबुओं से लेकर नेता तक बाज नहीं आते.  कुछ सरकारी बाबू अपने सरकारी आवासों को किराए पर भी दे देते हैं. जरा सोचिए कि यह कितना गंभीर और गैर- कानूनी मामला है. इस तरह के तत्वों पर सख्त एक्शन तो होना ही चाहिए.

बहरहाल, बात हो रही थी उन कलाकारों की जो सरकारी आवासों में लंबे समय से रह रहे हैं और उन्हें उन घरों को खाली करने के लिए कह दिया गया है. चूंकि ये सब देश के विशिष्ट नागरिक हैं, इसलिए इनसे अपेक्षा तो यही की जाती है कि ये अविलंब सरकारी आवासों को बिना अगर-मगर किए खाली कर देंगे.

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)