बिहारः कृषि बिलों के खिलाफ आरजेडी का केंद्र सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन

RJD Protest
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नए कृषि बिलों को लेकर पूरे देश में किसान सड़कों पर उतर आए हैं. किसानों को विपक्ष का भी पूरा सहयोग मिल रहा है. बिहार में आरजेडी ने कृषि बिलों के विरोध में सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रखा है.

आरजेडी ने आज (शुक्रवार को) बीजेपी सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाते हुए नए बिलों को वापस लेने की मांग की. आरजेडी ने कहा कि बीजेपी सरकार लगातार गरीब और किसान विरोधी फैसले ले रही है. सदन मे अपने संख्याबल का गलत इस्तमाल करते हुए एकतरफा फैसले ले रही है.

इस मौके पर प्रदेश अध्यक्ष अभय कुमार सिंह ने कहा की 2022 तक आय दुगनी करने की बात करने वाली सरकार 2020 में ही किसानों को सड़क पर पटकने की पूरी तैयारी कर चुकी है. उन्होंने कहा कि कहां केंद्र सरकार 50% ज्यादा MSP देने की बात करती थी. और अब MSP ही खत्म किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि यह अध्यादेश कहता है कि बड़े कारोबारी सीधे किसानों से उपज खरीद कर सकेंगे, लेकिन ये यह नहीं बताया कि जिन किसानों के पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है. वे इसका लाभ कैसे उठाऐंगे? सरकार एक राष्ट्र-एक मार्केट बनाने की बात कर रही है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि जो किसान अपने जिले में अपनी फसल नहीं बेच पाता है, वह राज्य या दूसरे जिले में कैसे बेच पाएगा ?

उन्होंने सवाल किया कि क्या किसानों के पास इतने साधन हैं कि वह दूर मंडियों में अपने सामान को ले जाने का खर्चा उठा पायेगा. वहीं युवा के प्रदेश अध्यक्ष रंजन कुमार ने कहा कि इस कानून के लागू होने पर अब पशुधन और बाजार समितियां किसी इलाके तक सीमित नहीं रहेंगी.

रंजन कुमार ने कहा कि अगर किसान अपना उत्पाद मंडी में बेचने जाएगा, तो दूसरी जगहों से भी लोग आकर उस मंडी में अपना माल डाल देंगे. और किसान को उनकी निर्धारित रकम नहीं मिल पाएगी. उन्होंने कहा कि इससे छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार पड़ेगी. जबकि विवाद होने पर सुलझाने के लिए 30 दिन के अंदर समझौता मंडल में जाना होगा.

उन्होंने कहा कि इस बिल से किसानों को सिर्फ परेशान करने का काम किया गया है. क्योंकि यदि विवाद मंडल में नहीं सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा. एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसानें को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि देश के 85 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत की जमीन है. विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और ऑफिसों के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाएगी. एसे मे क्या गरीब किसान इतनी परेशानी ले पायेगा.

वहीं प्रदेश महा सचिव आशुतोष रंजन ने कहा कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, झारखण्ड में तो छोटी और मझली जोत के किसान और भी अधिक है. किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानी यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की काला बाजारी के लिए लाया गया है.

उन्होंने कहा कि कम्पनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे. इस बदलाव से कालाबाजारी घटेगी नहीं बल्की बढ़ेगी और जमाखोरी बढ़ेगी. वही जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुकसान से कोई लेना देना नहीं होगा. इसका खामियाजा सिर्फ किसान को उठाना पड़ेगा.

रंजन ने कहा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में पहले किसानों पर खाद्य सामग्री को एक जगह जमा कर रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी. ये पाबंदी सिर्फ कृषि उत्पाद से जुडी व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी. अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूँजीपतियों को तो फायदा होगा.

उन्होंने कहा कि इस तरह के कानून की मदद से छोटी-छोटी मंडिया पूरी तरह खत्म हो जाएंगी. बड़ी कंपनियां की मनमानी बढ़ेगी और छोटे व्यापारी संकट में आ जायेंगे. कंपनियां किसानों की जमीन पर नियंत्रण करने लगेंगी जिससे कालाबाजरी बढ़ेगी. किसान पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के दायरे में आ जायेगा.

उन्होंने कहा कि इससे किसान और उसकी उपज पर प्राइवेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और सारा फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा. कृषि उत्पाद मार्केट कानूनों के तहत जो किसानों को फ्री व्यापार की सुविधा मिलती है. इससे मंडियां खत्म हो जायेगी.

उन्होंने कहा कि इस अध्यादेश से मंडी एक्ट केवल मंडी तक ही सीमित कर दिया गया है और मंडी में खरीद-फरोख्त पर शुल्क लगेगा जबकि बाहर बेचने- खरीदने पर इससे छूट मिलेगी. इसलिए साफ कहना है की इस तानाशाह सरकार को आम जनता की कोई फिक्र नहीं है, मैं सरकार से मांग करता हूँ की इस किसान विरोधी कानून को संसोधित करें.