मरीजों को मिलते हैं ये अधिकार, अस्पताल नहीं कर सकते मना

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कुछ समय पहले नोएडा में एक दो ने नहीं बल्कि कुल आठ अस्पतालों ने एक प्रेगनेंट लेडी को हॉस्पिटल में एडमिट करने से मना कर दिया था. कई ऐसे केस भी सामने आए हैं जहां देख गया कि किसी कोरोना पेशेंट को हॉस्पिटल ने एढमिट नहीं किया..

ऐसे में अब सवाल उठता है कि क्या किसी हॉस्पिटल को ये अधिकार है कि वो मरीज का इलाज न करे, क्या इलाज के लिए मना करने पर अस्पताल के खिलाफ मरीज कोई कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं

भारतीय संविधान में आर्टिकल 21 में नागरिकों को जीवन औऱ स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. आर्टिकल 47 में भी लिखा है कि राज्य को लगातार लोक स्वास्थ्य में सुधार और जीवन के स्टैंडर्ड सहित पोषण के स्तर को बेहतर करना होगा.

अगर मरीजों को संवैधानिक अधिकार नहीं मिलता हैतो उनके पास न्याय मांगने का अधिकार भी है. नेशनल हेल्थ बिल 2009 के तीसरे चैप्टर में मरीजों के लिए न्याय का अधिकार सुनिश्चित किया है. इसके मुताबिक अगर किसी व्यक्तिको स्वास्थ्य अधिकार नहीं मिलता है या स्वास्थ्य अधिकारों का हनन होता है तो वह कानून के तहत लड़ाई भी लड़ सकता है, अधिकारों का दावा करते हुए हर्जाना भी पा सकता है.

मरीज हो या पीड़ित ये किसी डॉक्टर या अश्पताल या किसी स्वास्थ्य केंद्र के खिलाफ अलग अलग कानून के तहत शिकायत दर्ज करा सकते हैं. मरीजों के पास 17 अधिकार होते है. मरीजों के ले 2018 में पहली बार देश में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक विस्तृत चार्टर जारी किया था. इस चार्टर में मरीजों के 17 अधिकार शामिल है.