अब का नहीं सदियों पुराना है AYODHYA में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद

नई दिल्ली. आज की युवा पीढ़ी यही मानती है कि 1992 की घटना के बाद से ही यह मामला सुर्खियों में है, लेकिन आपको बता दें कि अयोध्या में विवादित स्थल को लेकर करीब 165 साल पहले भी यहां सांप्रदायिक हिंसा हुए थे. सुप्रीम कोर्ट में मंदिर मस्जिद अभी भी फंसा हुआ है.

अयोध्या में हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी थी. इस घटना के बाद से यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है. बाबरी विध्वंस के बाद से विवादित स्थल की चाक-चौबंदी सुरक्षा कर दी गई है. यह मामला कोर्ट में लंबित है.

विवादित स्थल का इतिहास
1526 ई. में इब्राहीम लोदी को हराकर बाबर हुआ दिल्ली में दाखिल

फरगान का आक्रमणकारी ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर ने 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के अंतिम वंश (लोदी वंश) के सुल्तान इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में दाखिल हुआ था. बाबर ने इसके साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना की थी.

इतिहासकार मानते हैं कि भारत में आते ही बाबर ने यहां बड़े पैमाने पर मस्जिदों का निर्माण कराना शुरू कर दिया था. उसने पानीपत में पहली मस्जिद बनवाई थी.

इसके दो साल बाद बाबर ने 1528 में अयोध्या में एक मस्जिद बनवाया. इस मस्जिद को बनवाने के लिए बाबर ने ऐसी जगह चुनी जिसे हिंदू अपने अराध्य भगवान श्रीराम का जन्म स्थान मानते हैं.

1528 में बाबर ने अयोध्या में बनवाई थी बाबरी मस्जिद

दरअसल, दावा ये किया जाता है कि 1528 में मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ताशकंदी ने यहां एक मस्जिद बनवाई थी.

दावे के मुताबिक-मंदिर को तुड़वाकर बनवाई गई मस्जिद
हिंदुओं का बड़ा वर्ग यह दावा करता है कि यह मस्जिद उस स्थान पर बनाई गई है, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था. इसलिए अयोध्या ने भारतीय राजनीति को सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के सांचे में बांट दिया है.

1853 में पहली बार यहां विवादित स्थल को लेकर हुआ था विवाद
हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह भगवान राम का जन्म हुआ था और हिंदू संगठनों का आरोप रहा कि राम मंदिर को तुड़वाकर मस्जिद बनाई गई. हालांकि कई शोधकर्ताओं का कहना है कि असल विवाद की शुरुआत 18वीं सदी में हुई.

यहां मंदिर-मस्जिद को लेकर पहली बार हिंसा 1853 में हुई थी. उस समय यह नगर अवध क्षेत्र के नवाब वाजिद अली शाह के शासन क्षेत्र में था. हिंदू धर्म को मानने वाले निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया था कि मंदिर को तोड़कर यहां पर बाबर के समय मस्जिद बनवाई गई थी.

असल विवाद की शुरुआत 18वीं सदी में हुई
देश में जब तक मुगलों का शासन रहा तब तक अयोध्या में विवादित स्थल को लेकर कभी भी कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ.

1853 में पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक हिंसा हुआ थे. उस वक्त भी हिंदू यहां बने मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनवाना चाहते थे. इस हिंसा के वक्त देश में अंग्रेजों का शासन था.

हिंसा को शांत करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने एक फॉर्मूला ढूंढा था, जिसके तहत यहां विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी गई थी. बाबरी मस्जिद परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी. इसके बाद यह प्रक्रिया लगातार चलती रही.

सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा लिया
साल 1949 में भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. कथित रूप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया.

सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया. तब से विवादित स्थल पर दावेदारी को लेकर दोनों पक्ष कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं.

त्रेतायुगीन मंदिर के लिए संघर्ष
हिंदू पक्षकारों के अनुसार अयोध्या में रामजन्मभूमि पर त्रेतायुगीन मंदिर था जिसका समय-समय पर जीर्णोद्धार होता रहा और 1528 में मुगल आक्रांता बाबर के आदेश पर मंदिर तोड़ कर बाबरी का निर्माण कराया गया.

वहां बाबरी तो बन गई पर यह कभी निरापद नहीं रह पाई. रामजन्मभूमि मुक्त कराने का संघर्ष तब से जारी है.

संघर्ष के शुरुआती दिनों में हिंदू पक्ष को विवादित स्थल के सामने चबूतरा बनाने का अधिकार मिला और इसी चबूतरे पर मंदिर निर्माण कराने की इजाजत लेने के लिए निर्मोही अखाड़ा के तत्कालीन महंत रघुवरदास ने 1885 में सिविल कोर्ट का आश्रय लिया.

विवाद को लेकर 1934 में स्थानीय स्तर पर दंगा हुआ और एक पक्ष ने विवादित इमारत को काफी हद तक क्षति पहुंचाई. ब्रिटिश हुक्मरानों ने स्थानीय हिंदुओं पर कर लगाकर विवादित इमारत की मरम्मत कराई.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब ‘मेडिवल अयोध्या (अवध), डाउन टु द मुग़ल ऑक्युपेशन’ में कहते हैं कि बाबर उस साल अयोध्या में घुसा ही नहीं था-“पानीपत की जीत के बाद बाबर ने पूर्वी प्रांतों को क़ाबू करना शुरू किया.

उसने फारमुली वंश के शेख बायज़िद को अवध का गवर्नर बनाया. बायज़िद ने जब बग़ावती तेवर दिखाए तो बाबर ने 28 मार्च 1528 को अवध (अयोध्या) से क़रीब 5-8 मील पहले अपना कैंप लगाया.

बाबर के सिपाहियों ने बायज़िद को सरयू से पीछे खदेड़ दिया, जहां वह डेरा डाले था. ख़ुद बाबर ने अयोध्या में दाखिल होने का ज़िक्र नहीं किया है..”

रामलला के प्राकट्य का दावा यानी नए सिरे से विवाद
1949 में विवादित इमारत में रामलला के प्राकट्य का दावा किया गया. यह दौर विवाद को नए सिरे से अदालत में ले जाने वाला साबित हुआ.

विवादित स्थल के स्वामित्व का दावा लेकर निर्मोही अखाड़ा 1959 में एवं सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड 1961 में अदालत पहुंचा. लोअर कोर्ट सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने विवाद का निर्णय तो किया पर वह किसी पक्ष को मान्य नहीं हुआ.

हाईकोर्ट के निर्णय में विवादित स्थल को तीन हिस्सों में विभाजित किया गया, जिस स्थल पर रामलला विराजमान हैं, उसे रामलला को, रामलला के दक्षिण का हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को तथा सीता रसोई एवं रामचबूतरा का हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिए जाने का एलान किया गया.

%d bloggers like this: