अवध के लोगों ने भुलाया यूपी के चम्पारण को, किसान आंदोलन का केंद्र था रायबरेली

रायबरेली. आजादी के पहले अवध के किसानों को एक सूत्र में पिरोने और आंदोलन को धार देने वाले अवध किसान सभा की स्थापना के सौ वर्ष हो रहे हैं, लेकिन अवध के जिलों में ही पूरी तरह विस्मृत हो चुके इस संगठन और उसके आंदोलनों की वजह से ही जानकारों ने इसे उत्तर प्रदेश के चंपारण की संज्ञा दी थी.जिसने बाद में आजादी के संघर्ष में नींव का काम किया.

रायबरेली अवध किसान सभा की स्थापना से लेकर हर आंदोलन के केन्द्र में रहा है.वैसे तो अवध किसान सभा की स्थापना 17 अक्टूबर 1919 को प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के रूर गांव में हुई थी, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचन्द्र, माता बदल पांडेय,बैकुंठ नाथ मेहता सहित कई बड़े नेता व भारी सांख्य में किसान उपस्थित हुए थे.

रायबरेली से किसान नेता माता बदल मौर्य ने भाग लिया था. पहले इस संगठन को केवल प्रतापगढ़ में शुरू करने का विचार था, लेकिन वकील माता प्रसाद पांडेय के प्रस्ताव से इसे अवध के सभी जिलों में गठित करने पर सहमति जताई गई. उस सभा में ही संगठन के अध्यक्ष बाबा रामचंद्र को अध्यक्ष और माता प्रसाद पांडेय को सचिव बनाया गया था.

इस संबंध में 27 अक्टूबर को इंडिपेंडेंट अखबार में विस्तृत रिपोर्ट छपी थी. अवध क्षेत्र में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था, जिसमें गांव-गांव किसान सभाओं का गठन कर तत्कालीन जमीदारों और अंग्रेजो की दमनकारी नीतियों का विरोध करना था.

अवध किसान सभा के गठन के कुछ ही दिनों बाद रायबरेली जिले में पहली किसान सभा का गठन ऊंचाहार के कलकलियापुर में किया गया था. जिसमें बाबा रामचंद्र ने भी भाग लिया था. बाद में जल्दी ही जिले के ज्यादातर गांवों में किसान सभाओं का गठन हो गया.

रायबरेली में पहली बड़ी किसान सभा रामचंद्रपुर गांव के पास हुई थी. इन्ही किसान सभाओं के माध्यम से किसानों को संगठित होने का मौका मिला औऱ जमीदारों और अंग्रेजो के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का जज़्बा भी. महत्वपूर्ण यह है कि अवध किसान सभा के नेतृत्व में चला किसान आंदोलन कार्यशैली से अन्य आन्दोलनों से अलग था.

किसानों को भजन कीर्तन और रामायण के प्रसंगों के माध्यम से संगठित किया जाता था.जिससे इसका तेजी से प्रसार होता गया. शायद यही कारण है कि महात्मा गांधी भी अवध किसान सभा और रायबरेली में उसके संगठन शक्ति से अत्यंत प्रभावित थे.

रायबरेली में किसान आंदोलन को लेकर वैसे तो कई लोगों ने महत्वपूर्ण शोध किये हैं लेकिन प्रसिद्ध इतिहासकार कपिल कुमार की किताब इस आंदोलन को समझने में काफ़ी महत्वपूर्ण है. किसान आंदोलन पर लंबे अरसे से शोधरत वरिष्ठ पत्रकार फ़िरोज नकवी कहते है अवध किसान सभा ने ही पहली बार रायबरेली और अवध के अन्य जिलों में किसानों को संगठित करने का काम किया.

रायबरेली में तो आजादी के अन्य आन्दोलनों को भी इससे काफी गति मिली. तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने किसानों की इसी जिजीविषा के कारण रायबरेली को आजादी के कई आन्दोलनों का नेतृत्व भी सौंपा था. रायबरेली में अवध किसान सभा के नेताओं में मुंशी कालिका प्रसाद,पंडित अमोल शर्मा,जालीपा प्रसाद, माता बदल आदि कई महत्वपूर्ण नेता थे.

अवध किसान सभा ने जिस तरह आम लोगो यहां तक कि महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ा था,उससे अंग्रेजों को नींद उड़ गई थी. तत्कालीन खुफिया रिपोर्ट के आधार पर फर्जी मुकदमें भी दर्ज किए गए और उत्पीड़न किया गया. कुछ मामलों की चर्चा तो तत्कालीन लेजिस्लेटिव असेम्बली में हुई.

रायबरेली में अवध किसान सभा का बड़ा आंदोलन 7 जनवरी 1921 को हुआ था, जिसकी परिणिति मुंशीगंज गोलीकांड के रूप में हुई. इसमें सैकड़ों किसानों की जान गई थी. तत्कालीन जमीदार वीरपाल सिंह और अंग्रेजों द्वारा की गई. इस वीभत्स कृत्य से पूरा देश दहल गया था.

प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने इसे दूसरा जालियांवाला बाग की संज्ञा दी थी.हालांकि इस गोली कांड से किसानों की जिजीविषा कम नहीं हुई और बाद में भी किसानों ने संगठित होकर दमनकारी नीतियों का विरोध किया.

अवध किसान सभा की स्थापना और उसके संघर्ष में हमेशा रायबरेली की अहम भूमिका रही, लेकिन अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रही अवध किसान सभा के बारे में लोग भूल चुके हैं,लेकिन गुमनामी में खोई संघर्षों की इस महान विरासत को पत्रकार फ़िरोज नकवी सहित कुछ लोग सहेजने में जुटे है. उम्मीद है कि उनकी कोशिशों से लोग आम जन के इस संघर्ष के विषय में जरूर जान पाएंगे.

हिन्दुस्थान समाचार/रजनीश/राजेश

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