विपक्ष की दुर्दशा

अवधेश कुमार

लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद पूरे विपक्षी खेमे में एक अजीब किस्म का सन्नाटा है. चाहे वह मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी हो, वामपंथी दल, बसपा, सपा, राजद, तेलूगु देशम, जनता दल-सेक्यूलर, राकांपा, पीडीपी, सबकी चिंता एक ही है कि अब क्या होगा?

चुनाव परिणाम आने के पूर्व इनकी सोच थी कि भावी सत्ता में हम किस स्तर पर होंगे. अब चिंता है कि राजनीति में हम कहां खड़े हैं. और आगे कहां होंगे. 

गौरतलब है कि जिस भाजपा को ये धूल चटा रहे थे, उसने 2014 के मुकाबले न केवल 20 अतिरिक्त सीटें बढ़ाईं, बल्कि मतों में 6 प्रतिशत का इजाफा भी किया. 

सत्ता में सबसे बड़ी भागीदारी का ख्वाब कांग्रेस पार्टी देख रही थी. हालांकि अनेक विपक्षी दलों ने यह संकेत दिया था कि वो चुनाव बाद की स्थिति में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस की मदद लेंगे, लेकिन उसके हाथों नेतृत्व नहीं देंगे. 

बावजूद कांग्रेस में राहुल गांधी के रणनीतिकार मन ही मन मानकर चल रहे थे कि विपक्ष में सबसे ज्यादा सीटें उनकी ही आएगी. भाजपा को कोई समर्थन देना चाहेगा नहीं.

इसलिए बड़ी पार्टी के नाते सबको राहुल गांधी को नेता स्वीकार करना ही होगा. अब राहुल गांधी की हालत क्या हुई? परिवार की सबसे सुरक्षित परंपरागत सीट अमेठी से जनता ने उनकी बजाय स्मृति ईरानी को अपना प्रतिनिधि बनाना बेहतर समझा. 

अगर राहुल गांधी वायनाड नहीं गए होते, तो आज लोकसभा में पहुंचते ही नहीं. 16वीं लोकसभा में उनकी ही पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे सपना पाले हुए थे.

अगर राहुल को स्वीकृति नहीं मिली तो दलित होने के नाते उन्हें अवसर मिल सकता है. पर मतदाताओं ने केवल उनको ही धूल नहीं चटाई, बल्कि पूरे कर्नाटक से कांग्रेस को केवल एक सीट मिली. 

अब जरा अन्य पार्टियों के नेताओं की दशा देख लीजिए. सबसे पहले विपक्षी एकता की मुहिम ममता बनर्जी ने आरंभ की थी. उनकी कल्पना यह थी कि पश्चिम बंगाल में तो मेरा एकछत्र राज है. 

वामदल और कांग्रेस वहां मरनासन्न है. भाजपा की ताकत दो सीटों तक है. फिर कांग्रेस के बाद विपक्ष में सबसे ज्यादा सीटें लेकर मैं आउंगी और कोई पार्टी मेरे नेतृत्व का विरोध करेगी नहीं. इसलिए वो दिल्ली में अपनी मुहिम चलाती रहीं.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 23 जून के अंक में…

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