गैरसैंण के सवाल पर फिर उलझे सियासी दल

  • गैरसैंण स्थायी राजधानी के मसले पर भाजपा और कांग्रेस असहज
  • दोनों दलों के घोषणापत्र में अस्पष्ट तरीके से मौजूद रहा गैरसैंण

देहरादून. 02 दिसम्बर. (हि.स.). उत्तराखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के लिए अस्थायी राजधानी देहरादून में तैयारी तेज हो गई है, लेकिन गैरसैंण स्थायी राजधानी का सवाल सियासी दलों को फिर से उलझा रहा है. गैरसैंण में इस वर्ष एक भी सत्र आयोजित न किए जाने से बात बेशक शुरू हुई है, लेकिन बुनियादी सवाल फिर से सियासी फिजाओं में तैरने लगा है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने पर सियासी दल आखिर चाहते क्या हैं.

दरअसल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख सियासी दलों के चुनावी घोषणापत्र में गैरसैंण राजधानी का मुद्दा मौजूद है, लेकिन यह काफी उलझा हुआ है. इसमें कहा गया है कि पर्वतीय जनभावनाओं के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी. सियासी दल जिस पर्वतीय जनभावनाओं की ओर इशारा कर रहे हैं, वह एकदम साफ है. पर्वतीय जनभावनाएं गढ़वाल और कुमाऊं के केंद्र में स्थित गैरसैंण को स्थायी राजधानी के पक्ष में है. यही कारण है कि नवम्बर 2000 में राज्य गठन के दौरान तात्कालिक तौर पर भले ही देहरादून को राजधानी के तौर पर चयनित करते हुए राजकाज शुरू कर दिया गया हो, लेकिन गैरसैंण की प्रासंगिकता बनी रही. गैरसैंण के भराडीसैंण स्थान पर भव्य विधान भवन भी तैयार किया गया और वहां सत्र आयोजित करने की शुरूआत हुई.

एक समय उत्तराखंड की राजधानी में भाजपा और कांग्रेस दल दोनों ही गैरसैंण के मुद्दे से कन्नी काटते रहे. सिर्फ क्षेत्रीय दल यूकेडी वहां राजधानी की मांग करता रहा, लेकिन गैरसैंण के इतिहास में अहम मोड़, 2012-13 में तब आया, जबकि तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार ने वहां कैबिनेट मीटिंग कर दी और इसके बाद वहां कांग्रेस शासनकाल में सत्र आयोजित कर दिया गया. पहला सत्र तंबुओं में चला, लेकिन बाद में हरीश रावत सरकार ने वहां पर विधान भवन बना दिया. भाजपा सत्ता में आई, तो उसने भी वहां पर दो बार सत्र आयोजित किए, हालांकि इस बार सत्र नहीं हो पाया है.

भाजपा विधानसभा के भीतर गैरसैंण स्थायी राजधानी का प्रस्ताव लेकर भी आई है. कांग्रेस के प्रमुख नेता भी गैरसैंण स्थायी राजधानी की बात करते रहे हैं, लेकिन दोनों दलों के स्तर पर गैरसैंण स्थायी राजधानी के सवाल पर दो टूक बात करने में हिचक दिखती है.

वर्तमान में भाजपा जहां इस वजह से राज्य आंदोलनकारियों के निशाने पर है कि उसकी सरकार वहां सत्र आयोजित नहीं कर रही, तो कांग्रेस की भी सुविधाजनक स्थिति में नहीं है. पार्टी के दिग्गज नेता हरीश रावत वहां पर चार दिसम्बर को उपवास कर रहे हैं, लेकिन पूरी पार्टी ने अधिकारिक तौर पर गैरसैंण के सवाल पर विरोधस्वरूप न कोई कार्यक्रम दिया है और न ही पार्टी का स्टैंड बहुत मुखर होकर सामने आया है.

हालांकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह हों या शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक दोनों ही अपने अपने पक्ष की गंभीरता का दावा कर रहे हैं. इन स्थितियों के बीच, यूकेडी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट का आरोप है कि भाजपा और कांग्रेस गैरसैंण पर बेनकाब हो गए हैं.

हिन्दुस्थान समाचार

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