थम नहीं रहा कर्नाटक का संकट

अवधेश कुमार

कर्नाटक की राजनीति निस्संदेह किसी निष्पक्ष व्यक्ति के मन में निंदा पैदा करती है. विधानसभा के 224 सीटों में बहुमत के लिए 113 विधायकों का समर्थन चाहिए. 

एच. डी. कुमारस्वामी (HD Kumarswamy) के नेतृत्व में जनता दल-सेक्यूलर(JDU) और कांग्रेस (Congress) की सरकार को 118 विधायकों का समर्थन प्राप्त था. 

दोनों पार्टियों के 16 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया. दो निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को सौंपा, तो सरकार अल्पमत में आ गई. 

इसमें राजनीतिक शिष्टता यही थी कि कमारस्वामी (Kumarswamy) इस्तीफा देकर नई सरकार के गठन का रास्ता प्रशस्त करते. शेष बचे 208 सदस्यों की विधानसभा में 105 सदस्यों वाली भाजपा को दो निर्दलीयों का समर्थन है. 

जाहिर है, सरकार गठित हो जाती, तो ऐसा शर्मनाम दृश्य पैदा नहीं होता. किंतु जद-एस और कांग्रेस हर हाल में सरकार बनाए रखने की अनैतिक हरकत पर अड़े हुए हैं. 

केन्द्र में बीजेपी (BJP) की सरकार है इस समय देश की राजनीति में उसका बोलबाला है. इसलिए निष्कर्ष यह निकलता है कि बीजेपी (BJP) उस सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है. 

यानी इसके पीछे धनबल का खेल है. यह पूरे मामले का एकपक्षीय सरलीकरण है. अगर मंत्री तक अपने विधायकी से इस्तीफा दे रहे हैं और निर्दलीय मंत्री पद त्याग रहे हैं तो इसे पैसे का खेल नहीं माना जा सकता. 

अगर उनको पद और पैसा चाहिए तो इस सरकार में भी यह संभव था. आखिर प्रदेश में तो सरकार कांग्रेस और जद-एस की ही है. तो इनके पास विधायकों को देने के लिए बहुत कुछ होगा. 

जिन मंत्रियों-विधायकों ने सदस्यता से इस्तीफा दिया उनमें से कोई निर्धन परिवार से नहीं है. सब संपन्न हैं. तो असंतोष या सरकार से मोहभंग के दूसरे कारण हैं. 

इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, जनता की नजर में इस सरकार की बदनाम छवि. कर्नाटक में आम वातावरण यही है कि 24 मई 2018 से सत्ता में आने के बाद से यह सरकार एक दिन भी सहज रुप में काम नहीं कर सकी है. 

उसके पीछे भाजपा कहीं नहीं थी. देवेगौड़ा परिवार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच जानी दुश्मनी तथा कांग्रेस एवं जद-एस के बीच छत्तीस का रिश्ता इसका मूल कारण था. 

सिद्धारमैया और उनके समर्थकों ने कुमारस्वामी को एक मुख्यमंत्री के रूप में स्वायत्त होकर काम करने ही नहीं दिया.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 21 जुलाई के अंक में…

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