लॉकडाउन के चलते अस्थियां विसर्जन के लिए हरिद्वार नहीं जा पा रहे लोग

कठुआ, 19 मई (हि.स.). इस कोरोना वायरस महामारी के चलते मरने के बाद भी लोगों को निजात नहीं मिल रही है. कठुआ में कई ऐसे परिवार हैं जो लॉकडाउन के चलते अपनों की अस्थियां भी विसर्जित नहीं कर पाए.

यह परिवार अस्थियां विसर्जन करने के लिए कई बार जिला उपायुक्त के पास चक्कर काट चुके हैं, लेकिन जिला उपायुक्त द्वारा इन्हें सिर्फ दो टुक जवाब मिलता है कि जाने की अनुमति दी जाएगी लेकिन वापस आने की अनुमति नहीं दी जा सकती. जिसके चलते अपनों की अस्थियां श्मशान घाट में ही जमा करवा दी हैं.

इन परिवारों के साथ-साथ अब इन दिवंगत आत्माओं को भी लाॅकडाउन खुलने का इंतजार है, यानी साफ है कि लाॅकडाउन खुलने का इंतजार सिर्फ जिंदा लोगों को ही नहीं बल्कि जो लोग इस दुनिया से जा चुके हैं, उन्हें भी अब इस लाॅकडाउन के खुलने का इंतजार है.वहीं अब शहर के श्मशान घाट में अस्थियां रखने की जगह भी कम पड़ती जा रही है.

दरअसल लॉकडाउन के कारण श्मशान घाटों में अंतिम संस्कार के बाद अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने के लिए लॉकर में रख दी जा रही हैं.ऐसे में अब इनकी संख्या काफी ज्यादा हो गई है. परिजनों को लॉकडाउन खुलने का इंतजार है.हालांकि लॉकर में अस्थियां सुरक्षित हैं.जो लोग इस दुनिया को छोड़ कर चले गए हैं उनकी अस्थियां विसर्जन का इंतजार कर रही हैं.

कठुआ के रामलीला ग्राउंड के पास श्मशान घाट में पिछले डेढ़ महीने से जितने भी लोगों के अंतिम संस्कार हुए हैं उनकी अस्थियां श्मशान घाट में बने एक कमरे में लॉकर के अंदर बंद पड़ी हैं ,जिन्हें हरिद्वार में विसर्जन किया जाना है लेकिन इस कोरोना ने हमारे समाज के रीति-रिवाजों पर भी पानी फेर दिया.

हिंदू समाज में अंतिम संस्कार के बाद अगर उसकी अस्थियां हरिद्वार गंगा मैया में विसर्जित ना हो तब तक मरने वाले की आत्मा को शांति नहीं मिलती है.

वही वार्ड नंबर 2 के निवासी मनोज कुमार ने बताया एक महीना पहले उसकी दादी की मृत्यु हुई थी उसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियों को श्मशान घाट में ही बनाए गए कमरे के अंदर लॉकर में रखवा दी हैं.

वहीं वार्ड़ 3 के निवासी रजनीश कुमार के पिता की मृत्यु हुई थी, लेकिन लाॅकडाउन के कारण उन्होंने भी उनकी अस्थियां श्मशान घाट में रखवा दी हैं.उन्होंने बताया कि जब भी जिला उपायुक्त के पास इन अस्थियों को विसर्जन करने के लिए हरिद्वार जाने की अनुमति मांगते हैं तो डीसी कठुआ जवाब देते हैं कि जाने की अनुमति मिल जाएगी लेकिन वापस आने की अनुमति नहीं दी जा सकती.

वही जिला उपायुक्त ने इन लोगों को राय दी है कि अस्थियों को पुरमंडल या एरवां में विसर्जित करें.लेकिन डीसी कठुआ की राय लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाने लायक है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि वह अपनों की अस्थियों को पुराने रीति रिवाज के मद्देनजर हरिद्वार गंगा मैया में ही विसर्जित करेंगे. वही इन अस्थियों की देखभाल के लिए कठुआ के मुख्य श्मशान घाट में एक परिवार रहता है जो पिछले कई वर्षों से श्मशान घाट पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

उनका कहना है कि 25 के करीब अस्थियों उनके पास जमा है और अब मात्र 10 से ज्यादा नहीं रख सकते हैं, क्योंकि श्मशान घाट में बनाए गए कमरे में जगह कम पड़ रही है.

वहीं पत्रकारों को संबोधित करते हुए जिला उपायुक्त ने कहा है कि अगर एक इंसान जिंदगी भर आपके साथ रहता है तो उनकी अस्थियां थोड़े दिनों के लिए क्यों नहीं रख सकते. डीसी कठुआ ने कहा जबतक लाॅकडाउन चल रहा है तब तक अस्थियों को पेड़ों पर लटका कर रखे जैसे पुराने समय में होता था.

लेकिन लोगों की आस्था रीति रिवाज पुराने चलते आ रहे हैं, उनका मानना है कि हिंदू रिती रिवाज में अगर मृतक की अस्थियों को हरिद्वार में विसर्जित ना किया जाएं तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है.लेकिन वहीं इसके विपरीत जिला उपायुक्त उन्हें सलाह दे रहे हैं कि अपने पूर्वजों की अस्थियां पुरमंडल या एरवां में विसर्जन करें, नही ंतो लाॅकडाउन खुलने का इंतजार करेंय

हिन्दुस्थान समाचार/सचिन/बलवान

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