पहले जैसे मजबूत नहीं पटनायक

डॉ. समन्वय नंद

ओडिशा में 21 लोकसभा सीटों के साथ साथ विधानसभा की 147 सीटों पर भी चुनाव हो रहे हैं. बीजद के मुखिया तथा 19 साल से मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे नवीन पटनायक के लिए यह चुनाव 2009 व 2014 की तरह नहीं रहा. 

पटनायक इस बार अपने 21 वर्षों के राजनीतिक करिअर के सबसे अधिक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. भाजपा के सहयोग से हीी नवीन पटनायक की पार्टी बीजद का गठन हुआ था . 

तब 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजद व भाजपा ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा और कांग्रेस को पटखनी दी थी . इसके बाद बीजद लगातार भाजपा के साथ रहा. केंद्र में भले प्रकूल हालात हों, पर इसका लाभ राज्य में मिलता रहा. 

लगातार सत्ता में रहने के बीच बीजद ने 2009 में भाजपा से गठबंधन समाप्त कर लिया. भाजपा को ‘डंप करने’ की अपनी घोषणा से पहले नवीन पटनायक ने अकेले ही लड़ने के लिए पूरी तैयारी कर ली थी. 

उनकी इस रणनीति का लाभ मिला और पार्टी ने विधानसभा में 103 सीटें हासिल कर ली थी. इसी तरह 2014 में भी उमकी तैयारी जबरदस्त थी. इस चुनाव में बीजद की सीटें बढ़कर 117 हो गईं. 

इन दोनों चुनावों में बीजद पर प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व को मैनेज करने का आरोप भी लगा था. प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जयदेव जेना ने भी इस ओर इशारा किया था. 

इन दोनों चुनावों में खास बात यह थी कि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ही थी, जबकि भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी थी. भाजपा का उभार 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देश की बागडौर संभालने के बाद भाजपा का ओडिशा में भी उभार देखा गया. 

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का ओडिशा में बार बार प्रवास के जरिये जमीनी संगठन को मजबूत करने का कार्य हुआ. साल 2017 में राज्य में हुए पंचायÞत चुनाव में इसका असर दिखा. 

भाजपा को 2014 के आम चुनाव में मिलने वाले वोटों में अप्रत्याशित बृद्धि दर्ज की गई. 2014 के आम चुनाव में जहां भाजपा को जहां 18 प्रतिशत मत हासिल हुए थे, वहीं 2017 के पंचायत चुनाव में 33 प्रतिशत मत हासिल हुआ.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 1-15 मई के अंक में…

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