कुलभूषण पर पाक की करारी हार

अवधेश कुमार

17 जुलाई की शाम 6.30 बजे के पहले से ही पूरा देश हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले पर नजरें गड़ाए हुए था. आखिर एक निर्दोष भारतीय की जीवन रक्षा का सवाल है.

इस भारतीय को पाकिस्तान ने जासूस और आतंकवादी करार देकर फांसी की सजा सुनाई है. जैसे ही न्यायालय के अध्यक्ष अब्दुलकवी अहमद यूसुफ ने फैसला पढ़ना शुरू किया पाकिस्तानियों के चेहरे उतरने लगे.

वहीं, भारतीयों ने राहत की सांस लेना आरंभ किया. वास्तव में अपने फैसले के आठ मुख्य बिन्दुओं में न्यायालय ने एक भी शब्द भारत के विरुद्ध नहीं कहा है. सभी में पाकिस्तान के खिलाफ या उसके लिए नकारात्मक टिप्पणियां हैं.

फैलसे में पाकिस्तान की दी गई दलीलों को नकारा है. ये पाकिस्तान की करारी पराजय है. हालांकि इस फैसले से जाधव की रिहाई सुनिश्चित नहीं हुई है, लेकिन फांसी की सजा निलंबित हुई है.

अब नए सिरे से पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया की थोड़ी उम्मीद जगी है. हमारे लिए इस मुकदमे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि विश्व मंच पर हमने साबित कर दिया कि पाकिस्तान किस तरह एक लोकतांत्रिक देश की आड़ में सामान्य अंतरराष्ट्रीय नियमों-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए अपारदर्शी तरीके से किसी को भी मौत की सजा दे देता है.

पाकिस्तान ने जितने भी तर्क दिए न्यायालय ने उसमें से एक को भी नहीं माना. आठ में से सात विन्दुओं का फैसला 15-01 से हुआ है. 15 न्यायाधीशों ने पक्ष में और एक तदर्थ पाकिस्तानी न्यायाधीश विपक्ष में.

पाकिस्तान ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सुनवाई के योग्य है ही नहीं. सभी 16 न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से माना कि उनके पास 8 मई 2017 को भारत की तरफ से दर्ज कराए गए आवेदन को स्वीकार करने का अधिकार है. 

कंसुलर रिलेशंस यानी राजनयिक संबंधों पर 24 अप्रैल 1963 के वियना संधि के मुताबिक मामला उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.

पूरा लेख पढे़ं युगवार्ता के 28 जुलाई के अंक में…

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