क्या कर रहे हैं विपक्षी एकता के सूत्रधार

बद्रीनाथ वर्मा

कहां तो तमन्ना थी राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की, और अब अस्तित्व पर ही बन आई है. बात हो रही है तेलगुदेशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू की.

अभी हाल-हाल तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर विपक्ष को एकजुट कर पीएम मोदी की सत्ता की राह रोकने के प्रयास में सरकारी हवाई जहाज से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक चक्कर काटते थे.

लेकिन इस चक्कर ने उन्हें ऐसा घनचक्कर बनाया कि वे अब न तो घर के रहे, न घाट के. अपनी इस हालत के लिए नायडू स्वयं ही जिम्मेदार हैं. 

उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस कदर जोर मारा कि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा. आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य के दर्जे को लेकर एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी राजनीति का एकमात्र एजेंडा मोदी विरोध सेट कर लिया.

इसी एजेंडे पर वे अन्य विपक्षी दलों को भी एकजुट करने में लग गये. ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक और राहुल गांधी से लेकर फारुक अब्दुल्ला तक को एक मंच पर लाकर पीएम मोदी को जबरदस्त चुनौती देने की उनकी मंशा पूरी तरह से विफल हो गई.

दरअसल, विपक्ष एक मंच पर नहीं आ पाया तो इसके कारण कई थे. जैसे विपक्ष में कई दल ऐसे थे जो रायृज्यों में एक दूसरे के विरोधी थे. दिलचस्प बात यह है कि नायडू दिल्ली में बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहे थे.

और इधर जगनमोहन रेड्डी ने उनकी सियासी जमीन पर कब्जा कर ली. सवाल है कि आखिर नायडू इतनी उछलकूद क्यों कर रहे थे? 

चुनाव से पहले तक खुद को भविष्य का ‘किंग मेकर’ मानकर चल रहे चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली-कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है.

यानी वह भी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की लाइन में थे इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके ख्वाबों पर तुषारापात कर दिया.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 07 जुलाई के अंक में…

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