संदेशों को काश विपक्षी दल समझें

प्रभात झा

विश्वास है कि सभी राजनीतिक दल इस बार के जनादेश का अध्ययन कर रहे होंगे. वैसे अभी तक के विश्लेषण में राजनीतिक दलों के लिए अनेक सन्देश छिपे हैं. इस जनादेश ने इतिहास रचा है.

‘इतिहास’ घटता है न कि घटाया जाता है. अवसर तो भारत में बहुत बड़े बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों को मिला, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने सहमति और समन्वय का इतिहास रचा है.

यह वर्तमान राजनीति में अद्वितीय है. इस सन्देश के पीछे इस ‘समन्वय’ की बहुत बड़ी भूमिका है. नेता जो सोचता है, संगठन उसे पूरा करने में लग जाए और संगठन जो सोचे उसे नेता पूरा करने में लग जाए, यह सामान्य बात नहीं है.

इस जनादेश में कुछ महत्वपूर्ण सन्देश और भी हैं, जैसे भारत के जनविवेक को जातीय आधार पर देखना. जनतंत्र के 73 वर्ष में जनता परिपक्व हो गई है.

सके विवेक को जाति से जोड़कर अपना गुलाम या मजबूरी समझना हमारी नादानी हो सकती है, समझदारी नहीं. ‘जातीय’ मिथक तोड़ने का यह प्रयास निरंतर जारी रहना चाहिए.

सब समाज के लिए साथ में बढ़ते जाना सिर्फ गीत नहीं है. ”दल से बड़ा देश” महत्वपूर्ण संदेश है. अधिकतर दल तो सिर्फ परिवार चलाने के लिए पार्टी चलाते हैं.

अपवाद स्वरूप तो परिवारवाद या वंशवाद ठीक है, इस भाव पर आधारित राजनीतिक दलों को जनता ने धराशायी कर दिया. विरोध सार्थक – समर्थ और तथ्यों के साथ साथ जनता के विवेक को स्वीकार भी होना चाहिए.

अनर्गल आरोपों से नेता और उसके राजनीतिक दल का ही बुरा हश्र होता है. पुलवामा के बाद बालाकोट की घटना को देश ने सराहा, पर विपक्षी दलों ने मजाक उड़ाया. विपक्ष की इसको लेकर बड़ी आलोचना हुई.

देश में विकास और दिखते हुए काम की अनदेखी नहीं करनी चाहिए. आप दो आंखों से जनता को देखना चाहते हो, पर आप यह भूल जाते हो कि जनता हजारों आंखों से आपके हर कार्य को देखती है.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 01-15 जून के अंक में…

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