फिर अप्रासंगिक हुआ विपक्ष

एग्जिट पोल में एनडीए को भारी बहुमत मिलने के अनुमान के बावजूद जब तेलुगू देशम नेता चंद्रबाबू नायडू दिल्ली और लखनऊ में तमाम विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर रहे थे, तब शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ ने उन पर व्यंग्य करते हुए लिखा कि चंद्रबाबू नायडू बेकार में ही खुद को थका रहे हैं. 

लेकिन सच्चाई यह थी कि चंद्रबाबू नायडू खुद को थका नहीं रहे थे, बल्कि आने वाले पांच वर्षों को दृष्टि में रखते हुए आंध्र प्रदेश से बाहर राजनीति करने का कोई ठिकाना तलाश रहे थे. 

उन्हें पता था कि आंध्र प्रदेश में उनकी सरकार नहीं बनने जा रही और आने वाले दिनों में उनके लिए प्रदेश में रहना मुश्किल हो जाएगा. 

वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्डी उन तमाम मामलों में उन्हें सवालों के घेरे में खड़ा करेंगे, जो पिछले पांच वर्षों के उनके शासन काल में अंजाम दिए गए थे. 

अब चंद्रबाबू को ये बात कहां मालूम थी कि दिल्ली और लखनऊ में वे जिन नेताओं से मिल रहे हैं उनमें से अधिकतर की हालत भी उनके जैसी ही होने वाली है. 

23 मई को जो चुनाव परिणाम आए, वे विपक्ष के लिए ही नहीं भाजपा समर्थकों के लिए भी चौंकाने वाले हैं. जब से लोकसभा में विपक्षी दल के नेता के पद का सृजन हुआ है, तब से ये पहले दस साल होंगे जब लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं होगा. 

वैसे आने वाले समय में भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत कुछ होने वाला है जो पहले कभी नहीं हुआ था. निश्चित तौर पर विपक्ष के अप्रासंगिक होने की घटना तो महज एक शुरुआत है. 

जिस तरह एनडीए की जीत के बहुत से कारण नजर आ रहे हैं, उसी तरह विपक्ष की इस फजीहत के भी बहुत से कारण स्पष्ट हैं. सबसे बड़ा कारण यह कि विपक्ष ने इतिहास से सबक नहीं सीखा. 

आजाद भारत का इतिहास साक्षी है कि यहां की राजनीति में विरोध के लिए विरोध को जनता स्वीकार नहीं करती. नेहरू काल में हुए चुनाव हों या फिर इंदिरा गांधी के विरोध के नाम पर लड़े गए चुनाव हों, उनमें विरोधियों को कोई सफलता नहीं मिली. 

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 02 जून के अंक में…

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