भारतीय मूल की इस जासूस को ब्रिटिश सरकार ने किया सम्मानित, हिटलर की सेना की नाक में किया था दम

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दूसरे विश्‍व युद्ध में ब्रिटेन की तरफ से मित्र देशों की जासूसी करने वाली भारतीय मूल की नूर इनायत खान को लंदन में उनके पूर्व पारिवारिक घर में स्मारक ‘ब्लू प्लाक’ से सम्मानित किया गया. नूर पहली भारतीय ही नहीं, पहली दक्षिण एशियाई महिला बनीं हैं जिनके सम्मान में ब्लू प्लाक (Blue Plaque) का ऐलान किया गया है.

दरअसल नूर इनायत ब्लूम्सबेरी के 4 टैविटन स्ट्रीट में साल 1942-43 में रही थीं. आज उसी घर को ऐतिहासिक महत्व का दर्जा देकर ये प्लाक लगाया गया है. नूर इनायत खान ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की मदद की थी और जर्मनी के कब्जे में रहे फ्रांस में जाकर नाजियों की जासूसी की थी.

क्या है ब्लू प्लाक

इंगलिश हेरिटेज चैरिटी (English Heritage charity) की ओर से चलाई जाने वाली ब्लू प्लाक स्कीम के तहत प्रख्यात लोगों और संगठनों को सम्मानित किया जाता है जो लंदन में किसी खास भवन से जुड़े होते हैं.

लंदन में फिलहाल ऐसी 950 बड़ी-छोटी इमारतें हैं जहां उनसे जुड़ी शख्सियतों के सम्मान में ये नीली तख्तियां लगाई गई हैं.

पहले भी हो चुकी हैं सम्मानित

नूर की बहादुरी को देखकर उनकी मौत के बाद फ्रांस में ‘वॉर क्रॉस’ देकर उन्हें सम्मानित किया गया. ब्रिटेन में उन्हें क्रॉस सेंट जॉर्ज दिया गया. अब तक केवल तीन और महिलाओं को इस सम्मान से नवाजा गया है.

नूर के बारे में कुछ रोचक बातें

नूर इनायत ख़ान का जन्म 1914 में मॉस्को में हुआ था लेकिन उनकी परवरिश फ्रांस में हुई पर वो ब्रिटेन में रहीं थी. उनके पिता हिंदुस्तान से थे और उनकी मां अमरीकन थीं. नूर इनायत ख़ान मैसूर के महाराजा टीपू सुल्तान की वंशज थीं. नूर को हार्प और पियानो बजाना आता था. साथ ही वो काफी अच्छी फ्रेंच भी बोल लेती थीं.

बता दें कि नूर ब्रितानी सेना में शामिल हो गईं और 1940 में वो एयरफोर्स की सहायक महिला यूनिट में भर्ती हो गईं. नूर को एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन किया गया और जून, 1943 में उन्हें फ्रांस भेज दिया गया.

नूर पकड़े गए वायुसेना कर्मियों को ब्रिटेन भागने में मदद करती थीं. वो लंदन तक जानकारियां पहुंचाती थीं और मेसेज रिसीव भी करती थीं. फ्रांस में ब्रिटेन के लिए जासूसी करने में उन्हें कई खतरों का सामना भी करना पड़ा लेकिन नूर वापस नहीं आईं. उनके नेटवर्क के सभी एजेंट गिरफ्तार हो गए फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी पर एक दिन वो गिरफ्तार हो गई. गिरफ्तारी के बाद जर्मन एजेंटों ने ब्रितानी ऑपरेशन के बारे में जानकारी निकलवाने के लिए नूर को बहुत प्रताड़ित किया रक नूर ने अपनी जुबान नहीं खोली. कुछ समय बाद नाज़ियों ने उन्हें तीन अन्य महिला जासूसों के साथ गोली मार दी. मौत के वक्त उनकी उम्र महज 30 साल थी.