देश चाहे बदला !

बदला अथवा प्रतिशोध जैसे शब्द आम तौर पर अच्छे संदर्भ नहीं रखते, पर यही संदर्भ जब देश के स्वाभिमान से जुड़ जायं तो अपने अर्थ को व्यापक आधार प्रदान कर देते हैं. तब हर देशवासी अपने प्राण तक को हथेली पर रखकर आगे की पंक्ति में रहना चाहता है.

तब देश में राजनीति के पक्ष-विपक्ष और आंतरिक समाज के वर्गीय भेद एक झटके से तिरोहित
हो जाया करते हैं. आज इसी व्यापकता के साथ देश खड़ा है। वह बदला चाहता है. बदला उसके
स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वालों से.

यह चोट पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर आतंकवादियों के हमले से पहुंची है. हमला एक बार फिर पड़ोसी की साजिश का ही परिणाम निकला. ऐसे में देश का स्वाभिमान जाग उठा है. स्वाभिमान में यह जो अभिमान है, उसके लिए ही तो कवि मैथिलीशरण गुप्त ने यहां तक कहा है, ‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है. वह नर नहीं पशु निरा और मृतक समान है.

निश्चित तौर पर भारत देश ने अपने अभिमान के लिए बार-बार अपनी जीवंतता का परिचय दिया है देश के नाम पर लोगों की यह जीवतंता उनके शौर्य तक पहुंचती है. पाकिस्तान आधारित आतंकी घटनाएं दरअसल, हमारे राष्ट्रीय शौर्य को झकझोरने की गलती कर बैठती हैं…..

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 24 फरवरी के अंक में

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