भारतीय परंपरागत खेलों का विशिष्ट पर्व है नागपंचमी

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वाराणसी, 25 जुलाई (हि.स.).नागपंचमी का पर्व कहने को तो नागों का पर्व है. इस दिन नागों की पूजा करने का विधान है. नागपंचमी के दिन वासुकी नाग,तक्षक नाग, शेषनाग आदि की पूजा की जाती है. लेकिन यह पर्व भारतीय परम्परागत खेलों के लिए भी जाना जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में नागपंचमी की तैयारियां महीने भर पहले ही शुरू हो जाती हैं.

इस पर्व के अवसर पर अखाड़े और स्कूलों में दंगल और पारंपरिक प्रदर्शन की तैयारियां होती हैं. कुश्ती, कबड्डी, गदा, डंबल और नाल फेरने की प्रतियोगिताएं इस पर्व पर चलन में होती हैं. जिनमें युवा वर्ग तो रुचि लेता ही है, पर बुुजुर्ग भी पीछे नहीं रहते हैं.

खासकर वाराणसी में नागपंचमी के अवसर पर आयोजित होने वाले परम्परागत खेलों का पुराना रिश्ता रहा है. वाराणसी के हर प्राचीन अखाड़े में कुश्ती, जोड़ी गदा, डंबल की प्रतियोगिताएं होती है.

पहलवान संजय पांडेय बताते हैं कि नागपंचमी और कुश्ती की बहुत पुरानी परंपरा है. हम बचपन से देखते आ रहे हैं. इस दिन को गांव से लेकर शहर तक कोई ऐसा अखाड़ा नहीं जिसे सजाया न जाता हो. वहां कुश्ती न होती हो. गदा और डंबल न फेरे जाते हों. पहलवान अखाड़े की मिट्टी न लगाते हों. हालांकि आज भले ही मैट आ जाने के बाद मिट्टी के अखाड़े धीरे-धीरे बंद होने लगे हैं लेकिन नागपंचमी के दिन अखाड़े जरूर खुलते हैं. इसकी तैयारी सप्ताह-पंद्रह दिन पहले से ही शुरू हो जाती है.

पहलवान अशोक यादव ने बताया कि गांव में पहले मनोरंजन के साधन नहीं थे, खेल कूद के नाम पर कुश्ती, कबड्डी, दौड़,ऊंची कूद, लंबी कूद जैसे खेल थे. लिहाजा इन सभी का प्रदर्शन होता था. कुश्ती के साथ कौन पहलवान कितना फेरी गदा फेरता है, कौन कितना हाथ डंबल फेरता है इसका भी प्रदर्शन होता था. धीर-धीरे इसे प्रतियोगिता का दर्जा मिल गया. कुश्ती भी ईनामी हो गई. एक से बढ कर एक पहलवान आते अखाड़े में और अपने जूनियर संग कुश्ती लड़ते. इस कुश्ती से जूनियर को अपने सीनियर से कुश्ती के नए दांव भी मालूम होते थे.

युवा पहलवान अंश तिवारी ने कहा कि उन्हें नागपंचमी के अवसर पर होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता का बेसब्री से इंतजार होता है. इस साल कोरोना वायरस महामारी के सभी प्रतियोगताओं के रद्द होने से थोड़ी निराशा जरूर है.

हालांकि अब ये खेल की परम्पराएं समय के साथ विलुप्त होती जा रही हैं, जहां पहले नागपंचमी के अवसर पर वाराणसी सहित आसपास के इलाकों में प्रतियोगिताओं की भरमार होती थी,वहीं अब कुछ चुनिंदा जगहों पर ही इसका आयोजन किया जाता है. खिलाड़ियों का भी इनसे रिश्ता नहीं रह गया है.

वे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में आयोजित होने वाले खेलों में ही हाथ आजमाते हैं. आज कुश्ती, दंगल और व्यायाम न केवल स्कूल-कॉलेजों में भी नहीं होते हैं. सामाजिक संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले आयोजन भी धीरे-धीरे बंद हो गए हैं. नागपंचमी पर अखाड़ों में दंगल के प्रदर्शन होते थे लेकिन अब गिने चुने स्थानों पर ही नागपंचमी पर अखाड़े सजते हैं.

हिन्दुस्थान समाचार/सुनील