मोहम्मद शहजाद

‘इबादत के अधिकार से किसी को महरूम रखना गुनाह करने के समान है. फिर वह कौन से कारण हैं जिसके तहत मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद जाने से रोका जाता है.’

समाज में महिलाओं के प्रति भेदभाव कोई नई बात नहीं है. यही वजह है कि इसके विरुद्ध लंबे अर्से से आवाज बुंलद होती रही है. आज स्वयं महिलाएं भी अपने हक के लिए अधिक जागरुक और सजग हैं. कारणवश उन्होंने अपनी जद्दोजेहद से आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक मोर्चे पर गैर-बराबरी की बेड़ियां तोड़ने में कई सफलताएं हासिल की हैं. अलबत्ता उनकी धार्मिक आजादी की लड़ाई का मामला भी इनमें से एक है.

ऐसा ही एक मामला मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश और इबादत के अधिकार का भी है. इसको लेकर महाराष्ट्र के पीरजादा दंपति ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है. इसमें मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की मांग की गई है जिसे अदालत ने सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर लिया है. 

ऐसा पहली बार नहीं है, जब धार्मिक मठाधीशों के वर्चस्व को महिलाओं के द्वारा चुनौती दी गई. इससे पहले भी निसा प्रोग्रेसिव मुस्लिम वूमेन्स फोरम के जरिए न केवल मस्जिदों में औरतों के दाखिले, बल्कि इमामत (नमाज पढ़ाने) के अधिकार की मांग की गई थी.

इसी तरह केरल में कुरान सुन्नत सोसायटी की महासचिव जामिदा बीवी ने कुछ समय पूर्व इमाम की भूमिका अदा कर सबको चौंका दिया था. ज्ञात हो कि महिलाओं को केरल के सबरीमाला मंदिर और मुंबई की हाजी अली दरगाह के गर्भगृह में प्रवेश के लिए चले कामियाब आंदोलनों से काफी हौसला मिला है. इसीलिए उनके जरिए इस्लाम धर्म में अपने अधिकारों को लेकर आवाज उठाई जा रही है. यह बात दीगर है कि इस्लाम मजहब ने औरतों को चौदह सौ वर्ष पूर्व से ही मस्जिदों में जाकर नमाज अदा करने की अनुमति दे रखी है.

पैगम्बर मोहम्मद के जमाने में महिलाएं मदीना स्थित मस्जिदे-नबवी में बाकायदा जमात के साथ (इमाम के पीछे) नमाज अदा करती थीं. पैगम्बर के सम्बोधन से लाभान्वित होती थीं. दीन-धर्म की जानकारी और इस्लामी सिद्धांतों को जानने के लिए पैगम्बर और सहाबियों (पैगम्बर के साथी) की बीवियां मस्जिद में बड़ी तादाद में उपस्थित होती थीं. ऐसा कुरान के बाद सबसे पवित्र मानी जाने वाली इस्लामी किताब हदीस से प्रमाणित है.

सही बुखारी की हदीस नंबर 900 और सही मुस्लिम की हदीस नंबर 442 में वर्णन है कि अल्लाह के रसूल ने फरमाया- ‘अल्लाह की बंदियों को अल्लाह की मस्जिदों से न रोको’’. इसी तरह सही बुखारी की हदीस नंबर 865 और सही मुस्लिम की हदीस नंबर 442 में उल्लेख है कि औरतें अगर तुमसे रात की नमाज मस्जिद में अदा करने की इजाजत तलब करें, तो उन्हें इजाजत दे दिया करो.

अगर वर्तमान समय की बात करें, तो भी मुसलमानों के दो सबसे पवित्र स्थानों में गिने जाने वाले मक्का-मदीना में महिलाएं हज के दौरान पुरुषों के साथ-साथ इसकी रस्में अदा करती हैं. काबा का तवाफ करने (चक्कर लगाने) से लेकर सई (सफा और मरवा पहाड़ियों के दरमियान दौड़ना) और रमि-ए-जमरात (शैतान को कंकड़ मारना) जैसी हज की रस्में एक साथ अदा की जाती हैं. हरम शरीफ और मस्जिदे-नबवी में नमाज भी औरतें साथ-साथ और जमात के साथ (अर्थात इमाम के पीछे) पढ़ती हैं. बस उनके लिए जगह अलग होती है.

काबिलेजिक्र है कि मस्जिदों में महिलाओं के लिए जगह अलग होने के पीछे मकसद किसी तरह का भेदभाव नहीं, बल्कि अनुशासन बनाए रखना है. असल में इस्लाम ने महिलाओं को मस्जिदों में आने और नमाज की अदायगी के साथ-साथ मस्जिद की पवित्रता और सम्मान के मद्देनजर उन्हें कुछ बातें भी बताई हैं. जैसे चुस्त, बारीक अथवा ऐसे कपड़े न पहनें जिससे शरीर की नुमाइश हो. नमाज के लिए मर्दों की पंक्तियों में शामिल न हों और उनके पीछे अलग से पंक्ति बनाएं. यह हिदायतें उसी तरह हैं जैसे मर्दों के लिए मस्जिद में जाने की हैं.

सही बुखारी में इमाम मोहम्मद बिन इस्माइल अल बुखारी ने हजरत इब्ने अब्बास के हवाले से लिखा है कि पैगम्बर अपनी बीवियों और बेटियों को स्वयं दोनों ईद के मौके पर मस्जिद ले जाते थे. एक हदीस में हजरत उम्मे-अतिया की बात का वर्णन है जिसमें वह कहती हैं कि हमें ईद पर बाहर जाने और अपने साथ व्यस्क और कुंआरी लड़कियों के साथ-साथ मासिक धर्म वाली औरतों को भी साथ ले जाने की अनुमति थी. बस नमाज में पवित्रता को ध्यान में रखते हुए मासिक धर्म वाली औरतों को नमाजियों से अलग कतार में बैठने के लिए कहा गया है.

ऐसा इसलिए था कि मुस्लिम महिलाएं भी इन अवसरों पर किए जाने सम्बोधनों से अच्छी बातें सीख सकें. ईरान, तुर्की, मलेशिया, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में आज भी महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है. इसी तरह अपने मुल्क की बात की जाए, तो दिल्ली की जामा-मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिद में भी पांचों वक्त की नमाज औरतें मर्दों के साथ-साथ अदा करती नजर आ जाएंगी.

उपरोक्त बातों से यह साबित हो जाता है कि इस्लाम में महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश पर पाबंदी की बात बेबुनियाद है. सवाल यह उठता है कि फिर यह चलन बरसों से क्यों प्रचलित है? असल में महिला-पुरुष अधिकारों में नाबराबरी, सामाजिक विषमता और भेदभाव की जब भी बात आती है, तो उसके पीछे पुरुष प्रधान समाज जिम्मेदार होता है.

गौर से देखा जाए तो मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी की जड़ में भी कहीं न कहीं यही पितृ-सत्तात्मक सोच ही है. दरअसल इसके लिए बेतुका सा तर्क अव्यवस्था फैलने का दिया जाता है. इससे समाज में बहुत गलत संदेश जाता है. कोई भी यह सवाल कर सकता है कि मस्जिदों में जाने वाले नमाजियों का आचरण क्या खराब होता है, जो वहां महिलाओं के प्रवेश से अव्यवस्था फैल जाएगी?

अजीब बात यह है कि इस तरह की दलील देने वालों को मुस्लिम महिलाओं के बाजार जाने और पुरुषों के साथ-साथ खरीददारी करने पर कोई ऐतराज नहीं होता. इन्हीं बाजारों या फिर यात्रा के दौरान अगर नमाज का वक्त हो जाए, तो पुरुष करीब की मस्जिदों में जाकर नमाज अदा कर लेते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं. क्या यह बात उन्हें धार्मिक फर्ज से वंचित करना नहीं होगा?

प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान इमाम गजाली ने महिलाओं के मस्जिदों में जाने के लिए बयान किया कि ऐसा महज उनकी नमाज अदायगी के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान अर्जन के लिए भी जरूरी है. जब घर के लोग इस लायक न हों कि वह औरतों को धार्मिक मामलों को बता सकें, तो औरत के लिए घर से निकलना जायज ही नहीं आवश्यक है. इससे जाहिर है कि यह मामला धार्मिक नहीं बल्कि व्यवस्था की खामियों से जुड़ा है. इसीलिए एक साथ तीन तलाक की तरह ही इस मामले में भी अदालत से फैसला महिलाओं के पक्ष में होने की संभावना मुस्लिम महिलाओं का है.

मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा

इस्लाम में महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश पर कोई रोक नहीं है. न काबा और न मस्जिदे-नबवी में है और न ही दीगर मुल्कों की मस्जिदों में. विदेशी यात्राओं के दौरान मैंने मस्जिदों के अलावा पेट्रोल पम्प तक पर महिलाओं को नमाज पढ़ने का बंदोबस्त देखा. इसीलिए मैंने लखनऊ में संजय पीजीआई अस्पताल के पास अंबर नाम से एक मस्जिद का निर्माण करवाया है. इसकी आधारशिला मशहूर इस्लामी विद्वान मरहूम अली मियां नदवी ने 1997 में रखी थी. इसमें मर्द-औरत साथ-साथ बिना किसी भेदभाव के वर्षों से नमाज अदा कर रहे हैं.

शाही मस्जिद फतेहपुरी के इमाम डॉ. मुफ्ती मोकर्रम अहमद ने कहा

मस्जिदों में औरतों के नमाज पढ़ने पर पैगम्बर के जमाने में कोई पाबंदी नहीं रही और बाद में भी नहीं रही. दरअसल यह एक समाजी मामला है. मसलन फतेहपुरी मस्जिद में ही अलविदा और ईद की नमाजों में इतनी भीड़ हो जाती है कि मस्जिद के अलावा गली-कूचे भर जाते हैं. उस स्थिति में पुरुषों को ही जगह नहीं मिलती है. भीड़ कंट्रोल करना मुश्किल होता है. ऐसे में अगर औरतें आएंगी तो क्या होगा?

असल में औरतों को तो अल्लाह ने रिआयत दे रखी है कि वह घरों में नमाज पढ़ सकती हैं, लेकिन मर्द को जुमे और ईद के लिए मस्जिद आना जरूरी है. मस्जिदों में औरतों के आने पर कोई रोक नहीं है. अगर महिलाएं आना चाहती हैं, तो उनके लिए प्रवेश के साथ-साथ नमाज पढ़ने के लिए अलग से इंतेजाम होना चाहिए.

साभार युगवार्ता