मुस्लिम लीग की प्रेत बाधा
  • अंतिम क्षण तक कांग्रेस नेतृत्व झूठे उम्मीद के भ्रमजाल से निकल नहीं सका
  • पहले चरण में यह उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग अंतत: संविधान सभा में सम्मिलित हो जाएगी

रामबहादुर राय

मुस्लिम लीग की अनुपस्थिति संविधान सभा पर अंत तक छाई रही. इस तरह मानो संविधान सभा पर मुस्लिम लीग की प्रेत बाधा मंडरा रही हो. उससे चाहते हुए भी छुटकारा नहीं मिला. 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि अंतिम क्षण तक कांग्रेस नेतृत्व झूठे उम्मीद के भ्रमजाल से निकल नहीं सका. पहले चरण में यह उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग अंतत: संविधान सभा में सम्मिलित हो जाएगी. 

इसीलिए लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर बहस को एक माह के लिए टाल दिया गया. फिर भी मुस्लिम लीग नहीं आई. इसका प्रभाव और परिणाम संविधान सभा पर जो होना था, वह हुआ. 

ऐसा ही दूसरे चरण की बहस में शरीक लोगों के भाषण में दिखता है. इस चरण के दूसरे वक्ता नरहर विष्णु गाडगिल थे. वे लोकमान्य तिलक से प्रभावित होकर स्वाधीनता संग्राम में कूदे थे. 

आजादी के बाद नेहरू मंत्रिमंडल में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे. संविधान सभा में लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव के समर्थन में उनका बोलना स्वाभाविक था. उनके भाषण में नए तर्क हैं. जो पहले बोला गया है, उसमें उन्होंने नई धार दी. 

इसे उनके इस कथन से समझा जा सकता है,‘यह संविधान सभा न केवल शासन का स्वरूप विकसित करने के लिए है, बल्कि उसके विवरण को भी तैयार करने के लिए है.’

उनके इस कथन से स्पष्ट है कि संविधान सभा को उस समय जिस लक्ष्य को समझने की जरूरत थी, उसे ही वे व्यक्त कर रहे थे. उनके कथन का एक आधार भी था.

वह यह कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने अपने भाषण में कहा था कि ‘मेरे साथी इस इरादे से भारत जा रहे हैं कि वे उस देश को शीघ्रातिशीघ्र आजादी दिलाने की कोशिश करें.’

उसके बाद ही उनके मंत्रिमंडल के तीन सदस्य लार्ड पेथिक लारेंस, सर स्टेफर्ड क्रिप्स और ए.वी. एलेक्जेंडर 23 मार्च, 1946 को भारत पहुंचे. एटली के ‘साथी’ यही थे.

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