कांग्रेसी इकोसिस्टम के शिकार मुलायम

संजय कुमार झा

यह कांग्रेस का इकोसिस्टम है, जिसमें उनके सत्ता में होने न होने से बहुत अधिक अंतर नहीं आता. ताजा मिसाल मुलायम सिंह यादव और अखिलेश हैं, जिनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला एक बार फिर से जगा दिया गया है. 

ध्यान देने वाली बात यह है कि एक बार फिर से सर्वोच्च न्यायालय का इस्तेमाल किया गया है. लंबे समय से सोए पड़े याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी इसी साल जागे और सर्वोच्च न्यायालय पहुंचकर गुहार लगायी कि उन्हें बताया जाए कि सीबीआई जांच का क्या हुआ?

न्यायालय ने जल्द ही सुनवाई की तारीख दे दी. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति दीपक गुप्त की पीठ ने 25 मार्च को सुनवाई के बाद सीबीआई को नोटिस जारी कर मामले से संबंधित जांच रिपोर्ट के बारे में बताने को कहा. 

नोटिस मुलायम सिंह को भी गया. अगली सुनवाई के दिन यानी कि 12 अप्रैल को सीबीआई ने अदालत को बताया कि एजेंसी ने वह जांच पांच साल पहले ही बंद कर दी थी. 

सीबीआई की ओर से सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने दो सदस्यीय पीठ के सामने मौखिक रूप से कहा कि इस मामले में प्रारंभिक जांच की गयी थी, लेकिन उसे सितंबर 2013 में ही बंद कर दिया गया था. 

इस पर अदालत ने सीबीआई को चार सप्ताह में लिखित रूप से अपना पक्ष रखने को कहा. अब अदालत की मंशा कुछ भी हो, याचिकाकर्ता की मंशा कमोबेश पूरी होती दिख रही है. ऐन लोकसभा चुनाव के बीच प्रदेश के एक कद्दावर नेता पर कीचड़ उछालना. 

लेकिन मुलायम कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. वह पहलवान हैं और खेल समझते हैं. इसलिए उन्होंने एक शपथ पत्र के जरिए अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जानबूझ कर लोकसभा चुनाव के दौरान इस मामले को उठाया जा रहा है. 

यह राजनीतिक से प्रेरित है. सच भी यही है. यह किसी से छुपा नहीं है कि कांग्रेस पार्टी की इच्छा थी कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष के महागठबंधन में उसे भी जगह मिले. 

इसलिए नहीं कि उससे कांग्रेस को कोई बहुत बड़ा फायदा होने वाला था, बल्कि इससे पार्टी को यह साबित करने में मदद मिलती कि वह अभी भी प्रदेश में एक ताकत है. 

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 28 अप्रैल के अंक में…

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