धोनी के संन्यास पर हंगामा है क्यों बरपा…

  • धोनी ने छोटे शहर से निकल कर इस कामयाबी को हासिल करने के लिए एक बहुत मुश्किल सफ़र तय किया हैं
  • धोनी मैदान पर अपनी करिशमाई कप्तानी के लिए जाने जाते रहे हैं आज उनके संन्यास को लेकर सोशल मीडिया पर फैसला किया जा चुका है

कहते है कुछ लोग अपनी किस्मत लेकर पैदा होते हैं, लेकिन कुछ शख्स ऐसे भी भी होते हैं जो अपनी किस्मत खुद लिखते हैं. महेंद्र सिंह धोनी उन्हीं लोगों में से हैं. धोनी ने अपनी मेहनत, लगन, जुनून और जज्बे के बलबूते खेल की उन बुलंदियों को छूआ जो किसी सपने से कम नहीं.

ये बात किसी से छिपी नहीं कि सपने जितने बड़े होते है उसके पीछे उतनी ही मेहनत छिपी होती है. धोनी ने छोटे शहर से निकल कर इस कामयाबी को हासिल करने के लिए एक बहुत मुश्किल सफ़र तय किया हैं. एक वक्त महेंद्र सिंह धोनी ने जिसे भी छुआ वो सोना बन गया, ये धोनी ही थे जिसने दिखाया कि हारी हुई बाजी को जीत में कैसे तब्दील किया जाता है.

लेकिन मौजूदा दौर में कहानी पूरी तरह बदल चुकी है जो धोनी मैदान पर अपनी करिशमाई कप्तानी के लिए जाने जाते रहे हैं आज उनके संन्यास को लेकर सोशल मीडिया पर फैसला किया जा चुका है. वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में मिली हार के बाद सबसे ज्यादा बात इसी बात को लेकर की जा रही है कि आखिर धोनी कब क्रिकेट को अलविदा कहेंगे.

कई क्रिकेट फैंस तो मान चुके है कि धोनी अपना आखिरी मैच खेल चुके है. लेकिन इसके इतर उनके उस सफर पर नजर डालते है जिसके बदौलत उन्होंने भारत को क्रिकेट की दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई.

ये सफर है रांची में पैदा हुए एक ऐसे लड़के का…जिसे खुद अपनी उड़ान की ऊंचाई मालूम नहीं थी….ये कहानी है छोटे शहर में बड़े सपने देखने वाले एक नौजवान लड़के की… ये दास्तां है करियर और अपने सपने में किसी एक को चुनने की. ये एक ऐसे संघर्ष की कहानी है जो जिंदगी की कई कशमकश से भरी है. ये सफर है उस धोनी का जिसे लोग अपना आदर्श मानते है.

शुरूआत में धोनी अपनी फुटबाल टीम के गोलकीपर थे लेकिन अपने कोच की सलाह पर धोनी बचपन में क्रिकेट खेलने लगे. अपनी शानदार विकेटकीपिंग के जरिये उन्हें एक लोकल क्रिकेट क्लब में खेलने का मौका मिला. असल मायनों में उनके क्रिकेट करियर की शुरूआत यहीं से हुई.

इसके बाद वीनू मांकड़ अंडर 16 चैंपियनशिप में उन्होंने शानदार खेल दिखाया. उनकी बैटिंग और विकेटकीपिंग लगातार बेहतर होती गई और वे बिहार रणजी टीम का हिस्सा बन गए. साल 2001 में उन्होंने पश्चिम बंगाल के खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर की सरकारी नौकरी की.

हालांकि उनको यहां रूकना मंजूर नहीं था. धोनी ने कुछ अलग करने की ठानी और दिखाया कि जब आपके हौंसले बुलदं हो तो आप हार को हराकर नया मुकाम पा सकते है. धोनी को सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली जब 2003 में उन्हें इंडिया ए टीम में चुना गया.

इस सीरीज में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया. घरेलू क्रिकेट में भी वे शानदार प्रदर्शन करते रहे जिसके चलते 2004/05 में उन्हें बांग्लादेश जाने वाले टूर में शामिल कर लिया गया. अपने पहले ही मैच में वे दुर्भाग्य से शून्य पर रनआउट हो गए. इंटरनेशनल क्रिकेट में धोनी के बल्ले की गूंज तब सुनाई दी.

जब अपने पांचवे ही मैच में उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ ताबड़ तोड़ शतक ठोक के भारत को जीत दिला दी. अब धोनी को दुनिया माही के नाम से जानने लगी. मगर धोनी की सफलता का कारवां यहां कहां रुकने वाला था.

2007 के विश्वकप में भारत सुपर 8 में भी जगह नहीं बना सका और बांग्लादेश और श्रीलंका से हारकर बाहर हो गया. ये भारतीय क्रिकेट का सबसे मुश्किल दौर था. 2007 में ही T20 विश्वकप भी था. धोनी को इस विश्वकप के लिए भारतीय टीम का कप्तान बना दिया गया.

इस विश्वकप में मिली जीत ने धोनी की किस्मत को पूरी तरह बदल दिया. इसके बाद वनडे मैचो की कप्तानी भी धोनी को मिल गई. धोनी ने अपनी कप्तानी में भारत को टेस्ट में नंबर वन बना दिया और 2011 विश्वकप का विजेता भी बना दिया. उनकी कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड में हुई चैंपियन ट्राफी भी जीती.

यूं तो खेल के मैदान में धोनी की और भी ढ़ेरो उपलब्धियां है जिनकी किसी भी खिलाड़ी से तुलना करना बेईमानी होगा. लेकिन ऐसे वक्त पर जब धोनी अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर है तो उनकी आलोचना भी होने लगी.

खैर इस बात से धोनी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि इससे पहले भी कई महान खिला़ड़ियों को लेकर इस तरह की फजीहत झेलनी पड़ी हैं. इस बात में कोई दोराय नहीं है कि धोनी के खेल में अब पहले जैसी चमक नहीं रही हैं. लेकिन उनके खेल में दिए गए अतुल्यनीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता हैं.

अब इस बात की चर्चा भी जोरों पर है कि धोनी क्रिकेट की दुनिया से आराम लेकर अपने राजनीतिक पारी का आगाज कर सकते हैं. ये उनका अपना निजी फैसला हो सकता है लेकिन इस पर उन्होंने अभी तक कोई राय नहीं रखी हैं. ऐसे में उनके संन्यास से पहले ही इस तरह की अफवाहों को तूल देने का कोई मतलब नहीं बनता.

इसलिए जब बात उनके संन्यास की हो तो इस पर फैसला करने के लिए भी उन्हें अकेला छोड देना चाहिए. क्योंकि धोनी से बेहतर इस बात को कोई नहीं जानता कि उन्हें अपने विकेटकीपिंग गल्व्स को कब आराम देना हैं.

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