नरेन्द्र मोदी का न्यू इंडिया
  • भारत को अतीत की गौरवशाली विचार परंपरा की निरंतरता में ही साकार करने के लिए देशवासियों को प्रेरित कर रहे हैं
  • सवा सौ करोड़ देशवासी एक नया संकल्प करें.’’ वह संकल्प है- ‘‘सपनों से हकीकत की ओर बढ़ते जाना

आर.के. सिन्हा

पं दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशती वर्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘न्यू इंडिया’ या ‘नए भारत’ के  निर्माण का आह्वान किया. उन्होंने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 2022 का लक्ष्य भी निर्धारित किया है. 

तब भारत की आजादी के 75 साल भी पूरे हो जाएंगे. हमारे प्रधानमंत्री वस्तुत: एक भविष्यद्रष्टा हैं. वे भविष्य के भारत को अतीत की गौरवशाली विचार परंपरा की निरंतरता में ही साकार करने के लिए देशवासियों को प्रेरित कर रहे हैं. 

मोदी जी के विचार अतीत की ठोस वैचारिक जमीन पर ही आधारित हैं. उन्होंने कहा, ‘‘सवा सौ करोड़ देशवासी एक नया संकल्प करें.’’ वह संकल्प है- ‘‘सपनों से हकीकत की ओर बढ़ते जाना. जहां उपकार नहीं, अवसर होंगे. 

सभी को अवसर, सभी को प्रोत्साहन. नई संभावनायें, नए-नए अवसर. लहलहाते खेत, मुस्कराते किसान. नया भारत, स्वाभिमान युक्त भारत.’ यही हैं नए भारत के निर्माण का संकल्प. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास आंदोलन के ये ही मूल मूंत्र और सूत्र हैं.

वह नया भारत क्या है? कैसा होगा? मोदी के सपने का नया भारत? इसे समझने के लिए हमें जनसंघ के पुरोधा, एकात्ममानववाद के प्रणेता और प्रतिपादक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों के सागर में गोते लगाने होंगे. 

तभी हम कुछ मोती चुन सकेंगे. शुरुआत पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 1947 में लिखे एक लंबे लेख से ही करता हूं. यह आजादी से ठीक पंद्रह दिन पहले लिखा था पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने. 

सभी जानते थे कि देश अब आजाद होने ही जा रहा है. भारत के पुनर्निर्माण की गंभीर चुनौती उपस्थित थी. गर्मागर्म बहस चालू थी कि ‘हम कौन सा रास्ता चुनें?’

उन दिनों पूरे विश्व में समाजवाद और साम्यवाद का बोलबाला सा था. एक रास्ता पूंजीवाद का भी था. गांधी के ग्राम स्वराज का विचार भी एक विचारणीय भारतीय विकल्प था. 

तब पंडित जी ने देश को एक नई दृष्टि दी. वह उनके लेख में स्पष्ट रूप से वर्णित है. लेख का शीर्षक ‘भारतीय राष्ट्रधारा का पुण्य प्रवाह’ है. लेख की पहली ही पंक्ति है-‘‘हमारे राष्ट्र जीवन का भागीरथी प्रवाह आदि काल से चला आ रहा है.’’

वे पहली पंक्ति में ही तथाकथित प्रगतिशील और आधुनिक इतिहासकारों की काल गणना को खारिज कर देते हैं. 

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 16-30 अप्रैल के अंक में…

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