राजनीतिक समुंदर पार करने वाला विजेता

विजय त्रिवेदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी हमेशा कहते रहे हैं, ‘‘ही इज द मोस्ट क्रिटिसाइज्ड मैन इन इंडियन पॉलिटिक्स.’’ सच भी है.

देश में कोई राजनेता और पॉलिटिकल पार्टी की बात छोड़िए, ख़ुद बीजेपी में और मीडिया में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने मोदी पर टिप्पणी नहीं की हो, अपने तीर ना चलाएं हों.

लेकिन मोदी को मानों उन हमलों से ही ताकत मिलती गई और वे देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे ताकतवर, सबसे पसंदीदा नेता बन गए.

मौजूदा वक्त में देश के सबसे लोकप्रिय नेता माने जाने वाले मोदी की कहानी को कहीं से भी शुरू करें, चाहे वो बचपन में स्कूल छोड़कर संघ की शाखा में जाने की बात हो या फिर वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचना, या फिर 1995 में गुजरात बीजेपी से बाहर हो जाना, चाहे गुजरात दंगों के बाद 2002 में फिर से मुख्यमंत्री बनना.

या फिर मई 2013 की वो ड्रामा और सस्पेंस से भरी गोवा में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक. हर कहानी असंभव से संभावनाओं के दरवाजे खोलने की कहानी है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विपक्षी पार्टी के नेता हैं, लेकिन वे मोदी सरकार के बजाय सीधा मोदी पर हमला करते हैं. हर वक्त उनके निशाने पर मोदी होते हैं.

राहुल कभी मोदी को ‘सूट-बूट की सरकार’ कहते हैं, फिर संसद में अचानक भाषण खत्म करके सदन के भीतर प्रधानमंत्री को झप्पी देते हुए बताते हैं कि उनकी किसी से दुश्मनी नहीं, नाराजगी नहीं. 

लेकिन अगले कुछ ही दिनों में एक जनसभा में कहते हैं ‘‘चौकीदार सो रहा है.’’ फिर कुछ दिन बाद कहते हैं कि ‘‘चौकीदार चोर’’ है.

देश में बहुत से लोग खासतौर से विपक्ष की राजनीति करने वाले नेता शायद यह समझ नहीं पा रहे कि वे जितना हमला कर रहे हैं मोदी पर, मोदी के समर्थकों, प्रशंसकों और उनके चाहने वालों की तादाद भी उसी तेजी से बढ़ रही है.

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 16-30 अप्रैल के अंक में…

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