नेहरूवादी पूर्वग्रहों से मुक्ति

बनवारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारत की विदेश नीति को कांग्रेसी राज के सभी पूर्वग्रहों से मुक्त कर दिया है.

कांग्रेस राज की विदेश नीति के सभी पूर्वग्रह जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल के पूर्वग्रह थे. नेहरू ने अपने वैचारिक आग्रहों के कारण भारत की विदेश नीति को गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित किया था. 

इस आंदोलन में उनके साथ मिस्र के गमाल अब्दुल नासर, इंडोनेशिया के सुकर्ण और युगोस्लाविया के मार्शल टीटो मुख्य थे. यह सभी देश कुछ समय बाद अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए किसी न किसी गुट में शामिल हो गए. 

गुटनिरपेक्ष आंदोलन केवल नाम के लिए बचा रहा. लेकिन भारत में कांग्रेस शासन की नीतियां जवाहर लाल नेहरू के सिद्धांत से प्रभावित होती रहीं. कांग्रेस की विदेश नीति में पहला बड़ा परिवर्तन 1991 में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुआ था. 

वे नेहरू-इंदिरा परिवार की विदेश नीति के पूर्वग्रह से कुछ हद तक अपनी सरकार की नीतियों को अलग करने में सफल हुए थे. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इस दिशा में और प्रगति हुई. लेकिन मनमोहन सिंह के शासनकाल में फिर उन पूर्वग्रहों की छाया प्रकट होने लगी. 

स्वयं मनमोहन सिंह उन पूर्वग्रहों से ग्रस्त नहीं थे. लेकिन शासन की बागडोर वास्तव में सोनिया गांधी के हाथ में थी. इसलिए मनमोहन सिंह के शासन की नीतियों पर कांग्रेस के राजपरिवार के आग्रह छाए रहे. नरेंद्र मोदी के सत्ता में पहुंचने के बाद यह बीच की भटकन समाप्त हो गई.

पिछले पांच वर्षों में देश की विदेश नीति किसी वैचारिक पूर्वग्रह पर आश्रित होने के बजाय राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित हुई है. 

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि भारत में एक स्थिर, मजबूत और राष्ट्रवादी सरकार बनी है, जो स्वतंत्र विदेश नीति पर चल सकती है. इसलिए हम दुनिया की सभी बड़ी शक्तियों और देशों से बराबरी के आधार पर संबंध बनाने में सफल रहे हैं.

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 16-30 अप्रैल के अंक में

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