प्रवासियों का दर्द : जहन्नुम में जाए दिल्ली-मुंबई, अपना गांव अपनी धरती जिंदाबाद

बेगूसराय, 29 जून (हि.स.). देश के विभिन्न शहरों से अपना सब कुछ खोकर वापस लौट रहे कामगारों के लिए केंद्र और बिहार की सरकार ने कई स्तर की व्यवस्था कर रखी है. इससे वापस लौटे श्रमिकों को फायदा भी होने लगा है लेकिन सारी कवायद के बावजूद घर वापसी कर रहे श्रमिक वहां हुई परेशानी को भूल नहीं पा रहे हैं. देश के विभिन्न शहरों संवारने वाले लोग, अब गांव आकर अपने विकास की नई गाथा लिखने की बात कर रहे हैं. 

प्रवासी कह रहे है कि हम क्यों जाएं प्रवास का दर्द झेलने परदेस, अपना गांव-अपनी धरती जिंदाबाद. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, असम आदि शहरों को वर्षों से अपने श्रम शक्ति के बल पर प्रगतिशील बनाने वाले श्रमिकों को वहां जलालत हुई. घर वापस आ रहे इन श्रमिकों ने वहां की सरकार और अर्थव्यवस्था को बड़ी चुनौती दी है. बिहार के श्रमिकों के सस्ते श्रम शक्ति का साथ छूटने से लोगों की बेचैनी बढ़ गई है लेकिन घर वापस आए श्रमिक सुकून की सांस ले रहे हैं. 

विगत तीन महीनों में दिल्ली-मुंबई में इन्हें ना तो रात में नींद आ रही थी, ना दिन में चैन. काम धंधा सब बंद था, रोटी के लाले पड़ गए थे, राज्य सरकारों ने सभी को खाना उपलब्ध कराने के लिए बड़ी-बड़ी भाषणबाजी की. लेकिन सारी भाषणबाजी सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गई, श्रमिकों तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा था. अब सरकार सुरक्षित घर वापसी के लिए स्पेशल ट्रेन चला रही है तो रोज के रोज बड़ी संख्या में लोग घर वापस आ रहे हैं. इन सबके बीच सबसे बड़ा फायदा हुआ है कि लोग कोरोना वायरस के प्रति जागरूक हो गए हैं. ट्रेन एवं निजी वाहनों से डायरेक्ट घर नहीं जाकर सदर अस्पताल में जांच के बाद वे घर जाते हैं. सोमवार की सुबह भी सदर अस्पताल में कोरोना जांच के लिए बड़ी संख्या में प्रवासी पहुंचे. अब यह सब गांव में ही रहेंगे और अपने स्किल के अनुसार काम धंधा खोज कर अर्थोपार्जन में लग जाएंगे. 

रामभरोस तांती, सोहन तांती, राजाराम तांति, बैजनाथ दास, महेंद्र दास आदि ने बताया कि हम लोग 10-12 वर्षों से दिल्ली के उत्तम नगर में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करते थे. जब उत्तम नगर गए थे तो वहां हमारा परिश्रम देखकर लोगों ने हाथों-हाथ काम दिया, जाड़ा, गर्मी, बरसात किसी भी मौसम में एक भी दिन काम के अभाव में घर नहीं बैठे. हमारे हाथों में इतनी ताकत है कि महज कुछ दिनों में हमने बहुमंजिला मकान तैयार कर दी है, कई फैक्ट्रियां बना दी, दिल्ली में चकाचक सड़क का निर्माण कर दिया, नाले बनाए, मेट्रो चलाया. लेकिन लॉकडाउन होते ही दिल्लीवासी सब कुछ भूल गए, हम लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा. एक समय सरकारी खाना खाकर 15-20 दिन गुजारे, उसके बाद वह खाना भी बंद हो गया, कई दिन और रात चुरा- मिर्च के सहारे रहे. उसके बाद घर से पैसा मंगवाया और छुप-छुपकर राशन लाकर खाना बनाते थे और कमरे में कैद रहते थे. सरकार ने स्पेशल ट्रेन चलाई तो कई दिन स्टेशन तक पहुंचा, लेकिन लोगों के हुजूम को देखकर ट्रेन में सवार होने से हिम्मत ने जवाब दे दिया. 

अब जबकि अधिकतर लोग आ चुके हैं और आने वालों की संख्या कम हो गई तो दलाल के माध्यम से टिकट कटवा कर गांव आ गए हैं. अब यहीं मनरेगा में कुदाल चलाएंगे, जल जीवन हरियाली के तहत पर्यावरण संरक्षण की गाथा लिखेंगे, इसमें भी काम नहीं मिला तो खेत में कुदाल चलाएंगे. लेकिन दिल्ली लौट कर रहे जाएंगे, वहां की केजरीवाल सरकार सिर्फ भाषण बाजी करती है बाहरी लोगों को कहीं कोई आसरा नहीं. प्रधानमंत्री ने हम गरीबों को हुई दुर्दशा पर ध्यान दिया, जन कल्याणकारी योजना हर श्रमिकों के लिए कल्याणकारी साबित होगी. कम कमाएंगे लेकिन उसी में परिवार के साथ गुजारा करेंगे, सरकार ने जब ऐसी पहल की है तो हम क्यों जाएंगे फिर से प्रवास का दर्द झेलने, जहन्नुम में जाए दिल्ली मुंबई, अपना गांव जिंदाबाद. 

हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/सुनीत 

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