चीनी ‘एप्स’ पर प्रतिबंध का अर्थ

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

सरकार ने घोषणा की है कि उसने चीन के 59 मोबाइल एप्लीकेशंस (मंचों) पर प्रतिबंध लगा दिया है. उसका कहना है कि इन चीनी मोबाइल मंचों का इस्तेमाल चीनी सरकार और चीनी कंपनियां जासूसी के लिए करती होंगी. इनका इस्तेमाल करनेवाले लोगों की समस्त गोपनीय जानकारियां चीनी सरकार के पास चली जाती होंगी.

इतना ही नहीं, इन मंचों से चीनी कंपनियां हर साल अरबों रुपये भी कमाकर चीन ले जाती हैं. सरकार ने इन पर प्रतिबंध लगा दिया, यह अच्छा किया. टिक टॉक जैसे मंचों से अश्लील और अभद्र सामग्री इतनी बेशर्मी से प्रसारित की जा रही थी कि सरकार को इस पर पहले ही प्रतिबंध लगा देना चाहिए था.

मुझे आश्चर्य है कि भारतीय संस्कृति की पुरोधा यह बीजेपी सरकार इन चीनी प्रचार-मंचों को अब तक सहन क्यों करती रही? जो लोग इस चीनी ‘एप्स’ को देखते हैं, उन्होंने मुझे बताया कि हमारे नौजवानों को गुमराह करने की इनकी पूरी कोशिश होती है.

बांग्लादेश और इंडोनेशिया- जैसे कई देशों ने इन चीनी मोबाइल मंचों पर काफी पहले से प्रतिबंध लगा रखा है. असली बात तो यह है कि चीन की तथाकथित साम्यवादी सरकारों के पास आज न तो कोई विचारधारा बची है और न ही उन्हें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व है.

चीन अब अमेरिका की नकल पर शुद्ध उपभोक्तावादी राष्ट्र बन गया है. पैसा ही उसका भगवान है. डालरानंद ही ब्रह्मानंद है. बाकी विचारधारा, सिद्धांत, आदर्श, परंपरा और नैतिकता- जैसी चीजें चीन के लिए सब मिथ्या है.

चीनी चीज़ों से भारत में भी चीन की इन्ही प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल रहा है. जरूरी यह है कि इन पर तो रोक लगे ही, चीन की ऐसी चीज़ों पर भी एकदम या धीरे-धीरे प्रतिबंध लगना चाहिए, जो गैर-जरूरी हैं, जैसे खिलौने, कपड़े, जूते, सजावट का सामान और रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई छोटी-मोटी चीजें.

इससे भारत में आत्म-निर्भरता बढ़ेगी और विदेशी मुद्रा भी बचेगी. लेकिन जैसा कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है, आंख मींचकर सभी चीनी चीज़ों का हम बहिष्कार करेंगे तो हमारे सैकड़ों कल-कारखाने ठप्प हो जाएंगे और लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा.

इन मोबाइल एप्लीकेशंस के बंद होने का बड़ा राजनयिक फायदा भारत सरकार को इस वक्त यह भी हो सकता है कि चीन पर जबर्दस्त दबाव पड़ जाए. चीनी सरकार को यह संदेश पहुंच सकता है कि यदि उसने गलवान घाटी के बारे में भारत के साथ विवाद बढ़ाया तो फिर यह तो अभी शुरुआत है. बाद में 5 लाख करोड़ रु. का भारत-चीनी व्यापार भी खतरे में पड़ सकता है.

(लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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