बहानेबाज "बहनजी"

रामबहादुर राय

कांशीराम के जीवनकाल में मायावती को दलित अपना समाधान मानते थे. आज वे उन्हें बड़ा सवाल समझने लगे हैं. 2012 से ही मायावती पर सवाल उठने लगे. 

दलितों को अब तक उनका जवाब नहीं मिल पाया है. इसलिए मायावती का नाम ही एक बड़ा सवाल हो गया है. ऐसा नहीं है कि उन पर कभी कोई सवाल नहीं था. 

वह था. लेकिन तब कांशीराम का ‘कल्पवृक्ष’ दलितों को एक आश्वासन देता था. जो चाहो, वह मिलेगा. कांशीराम की छत्रछाया हटने से मायावती बसपा की सुप्रीमो तो हो गईं लेकिन वे सवालों के घेरे में भी आ गईं.

कांशीराम के निधन से ही मायावती पर हमेशा कोई न कोई सवाल बना ही रहता है. कभी पुराने सवाल होते हैं तो कभी नए. इस समय वे स्वयं गंभीर और बड़ा सवाल बन गई हैं. क्यों? सपा-बसपा से गठजोड़ का जिस दिन एलान हुआ, उस दिन मायावती ने संकेत दिया कि वे स्वयं लोकसभा का चुनाव लड़ेंगी. 

एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि वे कहां से इस बार चुनाव लड़ेंगी? उनका जवाब था कि जल्दी ही आपको पता चल जाएगा. इसे सकारात्मक सूचना समझ कर मायावती के समर्थकों ने यह अर्थ निकाला कि वे अपने लिए एक क्षेत्र चुनेंगी.

खबरें चलने लगीं. अटकलें लगाई जाने लगीं. ज्यादातर खबरें जो छपीं, उनमें अटकल थी कि वे अपनी पुरानी सीट से चुनाव लड़ने की जल्दी ही घोषणा कर देंगी. 

ऐसा हो जाता तो सवाल यह होता कि क्या मायावती चुनाव जीतेंगी? अगर जीतेंगी तो क्या रिकार्ड बनाएंगी? अगर नहीं जीततीं या कम वोटों से जीत पातीं तो उसका संदेश क्या जाएगा? ये सवाल अपनी जगह तब होते, जब वे अपने लिए अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र या दूसरा कोई क्षेत्र चुनतीं.

अब बिल्कुल नया सवाल खड़ा हो गया है. जो मायावती की उस घोषणा से पैदा हुआ है, जिसे उन्होंने 20 मार्च को की. उन्होंने अचानक यह घोषणा कर दी कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव में स्वयं कहीं से भी चुनाव नहीं लड़ने जा रही हैं. 

इससे बसपा में मायूसी छा गई. क्या ‘बहनजी’ इससे अनजान हैं? ऐसा लगता नहीं है. अगर ऐसा होता तो उन्हें बहानेबाजी या सफाई नहीं देनी पड़ती. 

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 1–15 अप्रैल के अंक में…

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